स्कंध पुराण 11वां पुराण माना गया है। इस पुराण के प्रथम अध्याय में महाभारत युद्ध का अत्यंत संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत किया गया है।
दूसरे और तीसरे अध्याय में नारदजी द्वारा वासुदेव श्रीकृष्ण को राजा निमि तथा नौ योगीश्वरों के संवाद सुनाकर माया, माया से निवृत्ति के उपाय तथा ब्रह्मा एवं कर्मयोग के बारे में बताया गया है।
चौथे अध्याय में भगवान की लीलाओं का वर्णन है। 7वें अध्याय से लेकर 8वें अध्याय तक श्रीकृष्ण के गुरुओं का वर्णन हैं। भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी को मां कहते हैं क्यों कि हम यहां जन्म लेते हैं। लेकिन सही मायनों में पृथ्वी हमारी गुरु भी है।
पृथ्वी: इंसान धरती पर कई तरह से हानि करता है लेकिन वह प्रतिशोध नहीं लेती। हमें पृथ्वी से धैर्य और क्षमा की सीख लेनी चाहिए।

प्राणवायु(ऑक्सीजन): जिस तरह हम सांस बहुत कम मात्रा में लेकर संतुष्ट होते रहते हैं उसी तरह चंचल मन पर काबू रख संतुष्ट रहना चाहिए।

आकाश: आग लगने, पानी बरसने पर भी आकाश नष्ट नहीं होता उसी तरह हमें भी अपनी आत्मा को अखंड रखना चाहिए।

जल : जल स्वभाव से स्वच्छ और पवित्र करने वाला होता है। ठीक जल की तरह स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए।

अग्नि : जैसे अग्नि सब कुछ जला देती है ठीक उसी तरह हमें भी अपने बुरे कर्मों को जलाकर पवित्र हो जाना चाहिए।

समुद्र: समुद्र की तरह हमें सदा प्रसन्न और गंभीर रहना चाहिए।

चंद्रमा : काल के प्रभाव से चंद्रमा की कलाएं घटती-बड़ती रहती हैं। इसलिए हमें किसी समस्या से परेशान नहीं होना चाहिए। समस्याएं आती हैं और चली जाती हैं।

सूर्य : जैसे सूर्य किरणों से जल अवशोषित कर समय पर बरसा देता है। उसी तरह विषयों का भोग कर समय पर उनका त्याग कर देना चाहिए।

Source – NaiDunia





