भगवान शिव के अनेक मंदिरों और तीर्थों  से जुड़ी हजारों रोचक किवदंतियां और पौराणिक मान्यताएं हैं. ऐसा ही प्राचीन शिव मंदिर सिद्धेश्वरनाथ मध्यप्रदेश के बैतूल जिले की भैंसदेही तहसील में पूर्णा नदी के किनारे स्थित है.  वास्तुकला में बेजोड़ इस मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में रघुवंशी राजा गय ने कराया था. इस मंदिर के बारे में ऐसा कहा जाता है कि नागर-भोगर नाम के दो भाई थे जो एक ही रात में पूरा मंदिर बना देते थे. लेकिन जब वे इस शिव मंदिर का निर्माण कर रहे थे तो वो अचानक पत्थर के बन गए और मंदिर का निर्माण अधूरा रह गया.

यहां के पत्थर लोगों को करते हैं सम्मोहित-

इस मंदिर का एक एक पत्थर स्थापत्य कला की मिसाल है. इसमें सबसे खास मंदिर के गर्भ ग्रह के सामने स्थापित नंदी की प्रतिमा है जिसे पत्थर से ठोकने पर उसमें से खनक की आवाज आती है.  कहा जाता है कि इस मंदिर में चारों तरफ बिखरे पत्थर लोगों को सम्मोहित करते हैं, लेकिन जिसने भी इन पत्थरों को अपने साथ ले जाने की भूल की वो बर्बाद हो गया. यहीं वजह है कि लोग यहां का एक भी पत्थर चोरी करके अपने साथ ले जाने की हिमाकत नहीं करते.

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पत्थर बन गए थे कारीगर-

मान्यता के अनुसार राजा गय भगवान शिव का भक्त था जिसने उस वक्त के प्रसिद्ध वास्तुशिल्पी भाई नागर-भोगर को महिष्मति में शिव मंदिर बनाने का आदेश दिया. नागर-भोगर के बारे में बताया जाता है कि ये दोनों भाई निर्वस्त्र अवस्था में मंदिर निर्माण कार्य करते थे और केवल एक रात में बड़े से बड़ा निर्माण कर देते थे. लेकिन इन्हें एक शाप मिला हुआ था कि अगर किसी ने इन्हें नग्न अवस्था में निर्माण करते देख लिया तो वो पत्थर के बन जाएंगे.

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दोनों जब मंदिर का निर्माण कर रहे थे तब उनकी बहन खाना लेकर अचानक निर्माण कक्ष में आ गई और उसने अपने भाईयों को देख लिया, जिसके बाद दोनों भाई पत्थर के बन गए. मंदिर का निर्माण अधूरा रह गया और इसका गुंबद फिर कभी नहीं बन सका.

इस प्राचीन शिव मंदिर के गर्भग्रह में स्थापित शिवलिंग को पौराणिक अभिलेखों में उप ज्योतिर्लिंग भी माना गया है. मंदिर का कोना-कोना स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है, जो यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को सम्मोहित कर लेता है. बताया जाता है कि इस मंदिर को कुछ इस तरह से बनाया गया है कि सूर्य की पहली किरण और पूर्णिमा के चांद की पहली किरण सीधे मंदिर के गर्भग्रह को छूती है.

Source: News18

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