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यदि आप सिर्फ बोलना जानते हैं, तो कभी सफल नहीं हो सकते।’ सुनना एक कला है, जिसे अपने भीतर विकसित किया जाए तो इससे जीवन में सफलता की सीढ़ियां आसान हो सकती है। जिस व्यक्ति में सुनने की कला या ‘लिसनिंग स्किल’ होती है। वह दूसरों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने में हमेशा सफल होता है।

किसी के सिर के पीछे देखने जैसा दूसरा कोई संकेत नहीं है, जो तुरंत बता दे कि “मैं आपकी बात पर ध्यान नहीं दे रहा हूँ”। अपने सम्मान और मनोयोग को जताने के लिए वक्ता की आँखों में झांकें।

कुछ लोग बार-बार “आँखों से संपर्क बनाने में” असहज महसूस करते हैं। अपने आपको आँखों से संपर्क के लिए प्रशिक्षित करने का एक अच्छा तरीका आंखों के आस-पास, उनके बीच या नाक पर देखना है।

वक्ता को प्रोत्साहित करने के लिए स्वीकृति में सिर हिलाएं, मुस्कारायें। आपके छोटे-मोटे वाक्य जैसे “हाँ”, “सही” आदि यह दर्शाएंगे कि आप बातचीत में शरीक हैं, संजीदगी से सुन रहे हैं और यह कि वक्ता को और सुनने की ख्वाहिश रखते हैं।

संवाद का एक बड़ा भाग शरीर की स्थिति और भाव-भंगिमाओं के माध्यम से भी होता है। व्यक्ति जो संकेत देता है, उन पर गौर करें। कार-दुर्घटनायें मजाक की बात नहीं होतीं, लेकिन मद्यप अवस्था में हाल में हुए टकराव के बारे में अगर चमकती आँखों, खीसें निकालकर और भौंडे इशारों से बताया जा रहा है, तो यह संकेत है कि कहानी दरअसल हास्यास्पद है।

एक श्रोता के रूप में अपने खुद के शरीर की भाषा पर भी ध्यान दें: एक दुखद कहानी के बीच आप अगर मुस्कुरा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप बातचीत से कटे, उदासीन हैं और आपका जेहन कहीं अपने में ही खोया हुआ है। बैठें, आगे-झुकें और तत्परता से सीधे आँखों में झांकें।

भले ही वह एक कोने में बातचीत हो, फोन पर हो या सुखद बरिस्ता में, वक्ता और किसी अन्य चीज के बीच में आपका ध्यान बंटाना यह संकेत देगा कि आपकी दिलचस्पी नहीं है।

कई बार सुनने की बजाय हम बोलने के लिए उतावले होकर अपनी बारी का इंतजार करना पसंद करते हैं। अपनी बात ख़त्म करने से पहले दूसरा व्यक्ति क्या कहेगा, या उनकी बात के खंडन के लिए कमर कसने का अर्थ यह है कि आप वास्तव में बातचीत में नहीं हैं, आप सिर्फ अपनी बारी के लिए इंतजार कर रहे हैं। जब तक सही मौका न आये, प्रतिक्रिया में अपना रुख तय करने का इंतज़ार कीजिये।

फोन पर बातचीत के दौरान मल्टीटास्किंग होना दक्षता को दिखाने वाला जरूर मालूम होता है, अगर श्रोता आपको न देख रहा हो, लेकिन हकीकत में आप बातचीत की बजाय दूसरी चीजों में अपना ध्यान भटका रहे हैं।

यदि कोई ऐसा कुछ कह रहा है, जिससे आप बिल्कुल असहमत हैं, तो भी सभ्य बने रहें। अपनी असहमति को जताने के लिए एक उपयुक्त और विनम्र मौके का इन्जार कीजिये। जिस राजनीतिज्ञ के आप समर्थक हैं, उसके खिलाफ आपके अंकल की कड़वी आलोचना को गौर से सुनना आपको बाद में उन्हें पूरी तरह से निरस्त्र करने के अस्त्र देगा।।

आप सुन रहे हैं, इसका संकेत देने का एक अच्छा तरीका यह भी है कि जो आपको बताया जा रहा है, उसे समय-समय पर दोहरायें। “जो आप कह रहें है, उसका अर्थ है कि…” या “मैंने जो सुना, वह…” वक्ता को प्रोत्साहित करेंगे। यह सुनने में अगर आपको कोई गलतफहमी हुई है, तो उसे स्पष्ट करने का उन्हें अवसर भी देता है।

सक्रिय रूप से सुनने का एक और शानदार तरीका है कि खुले तौर पर प्रमुख सवाल पूछे जाएँ, या अगर आप को उलझन है तो उसे स्पष्ट करने के लिए कहा जाए। अगर आप सवाल पूछ रहे हैं, तो यह बताता है कि आप प्रतिक्रियाओं में रुचि रखते हैं, जो वक्ता को सहज महसूस कराता है।

जटिल जवाबों वाले सवालों को भी आजमायें: “आपका प्रमुख विषय क्या था?” से ज्यादा दिलचस्प “आपके लिए कॉलेज के दिन कैसे थे?” होगा।

एक व्यक्ति की बातें अगर बुझने लगें, तो निर्दिष्ट ब्यौरा देने के लिए कहें। “पेरिस में लोग कैसे हैं?” या “आपके चाचा व्यंग्य पसंद करते हैं?” जैसी बातें पूछना वक्ता को बोलने का एक नया आयाम देकर कहानी में दोबारा जान डाल देगा।

बातचीत में योगदान की जब आपकी बारी आये तो अपने को वक्ता की जगह पर रखें। मसले पर अपनी राय को सम्मान पूर्ण ढंग से, खुले, खरे और ईमानदारी से रखें।

वक्ता की कही गयी बात को तोतारटंत जुबान में दोहराना या जो वे चाहते हैं उसे ही कहना, स्वीकृति पाने का एक आसान तरीका है, और उनकी भावनाओं की पूरी अनदेखी करना कठोरता है। दोनों ही अच्छे श्रोता के लक्षण नहीं हैं।

बातचीत एक तरीके की अंतरंगता का ही रूप है। किसी ने आप पर इतना भरोसा किया है कि आपको अपनी कुछ बातें बता पाए, और वह आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहता है, इसलिए संवेदनशील बनिए।

सामुहिक बातचीत यदि प्राइमरी के लंच के दौरान की हंसी-ठिठोली वाली घटनाओं के इर्द-गिर्द चल रही हो, और आप अचानक विषय को भटकाकर ई ओर मोड़ दें की विदेश में अध्ययन के लिए जाने को लेकर आप कितने उत्साहित हैं, तो यह अच्छे श्रोता का लक्षण नहीं है।

आपको अगर बोलना नहीं है। यह भी ठीक है अगर आपको बातचीत के एक विशेष विषय में कुछ योगदान नहीं करना है, लेकिन उस तरह से विषय को भटकाना आत्मकेन्द्रियता और असभ्यता है। वक्ता को बोलने के लिए प्रोत्साहित करें और देखें कि आप क्या सीख सकते हैं। अगर कोई चीज स्पष्ट नहीं है, तो हमेशा पूछ लीजिये। अनुमानों के आधार पर धारणा बनाने की कोशिश मत कीजिये।

 

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