lord shiva nandi bull

हिन्दू धर्म में माँ बाप अपने बच्चे को बचपन से ही सिखा देते है, की कभी भी किसी जीव को नुकसान नहीं पहुँचाना है। किसी भी जीव की हत्या नही करनी है। सबसे खास बात हिन्दू धर्म में प्रकृति और पशु-पक्षियों को भी दया की दृष्टि से देखने की बात कही जाती है।

हिन्दू देवी-देवताओं से जुड़ी किसी भी कहानी से जीवन की एक सीख छिपी होती है, जिसे जीवन में उतारने से फायदा ही होता है। नुक्सान नही होगा यदि किसी को समझ आ गया है, कि हिन्दू धर्म बहुत ही सुन्दर और स्पष्ट है, तो आप देवी देवताओं के साथ अपने धर्म को भी जाने।

हिन्दू देवी-देवताओं से जुड़ी किसी भी कहानी से जीवन की एक सीख छिपी होती है, जिसे जीवन में उतारने से फायदा ही होता है.अलग-अलग देवी-देवताओं  ने अलग-अलग पशु-पक्षियों को अपनी सवारी के रूप में चुना है।  इस प्रकार प्रकृति और उसके जीवों की रक्षा का एक अनिवार्य संदेश भी समाज में प्रेषित किया गया है।

पशु-पक्षियों को किसी न किसी भगवान के प्रतिनिधि से जोड़ना, उनके खिलाफ़ हिंसा से बचाने के लिए एक सुरक्षा कवच की भांति है। आज हम जानते है कि शिव भोले ने अपनी सवारी को क्यूँ और किस तरह चुना है।

 शिव की सवारी बैल:

अकसर देखा जाता है कि शिव की मूर्ति के सामने या उनके मंदिर के बाहर शिव के वाहन नंदी की मूर्ति स्थापित होती है। नंदी बैल को पुराणों में भी विशेष स्थान दिया गया है। नंदी अपने ईश्वर शिव का केवल एक वाहन ही नहीं बल्कि उनके परम भक्त होने के साथ-साथ उनके साथी, उनके गणों में सबसे ऊपर और उनके मित्र भी हैं।

नंदी शिव का सबसे करीबी साथी है क्योंकि उसमें ग्रहणशीलता का गुण है। नंदी बैल को शिव के वाहन के रूप में तो सभी जानते हैं लेकिन इन दोनों का मिलन किन परिस्थितियों में हुआ, किन परिस्थितियों में एक सामान्य सा युवक बैल के रूप में दिखने लगा और किन परिस्थितियों में नंदी, शिव को परम प्रिय हो गए, इस बात पर कम ही लोगों का ध्यान जाता है। चलिए हम आपको बताते हैं नंदी बैल का आध्यात्मिक रहस्य।

नंदी या नंदीश्वर भगवान शिव के वाहन है और उनके दिव्य निवास अर्थात कैलाश पर्वत के द्वार-संरक्षक देवता है

शैव संप्रदाय में नंदी को बैल की मुख वाले एक बौने के रूप में दर्शित किया गया है और वे भगवान शिव के निष्ठावान परिचर और गणों के मुखिया है

वैदिक पुराणों ने नंदी का एक योद्धा के रूप में वर्णन किया है जिसका रूप बैल के मुख के साथ मानव शरीर का था। उन्हें नंदिकेश्वर या अधिकारनन्दिन जैसे विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता है।

नंदी ऋषि शिलादा के दत्तक पुत्र थे। उन्होंने भगवान शिव के प्रति महान समर्पण दिखाया और कभी भी उनकी अवज्ञा नहीं की

शिव मंदिरों में पत्थर से बनी नंदी की नक्कशीदार मूर्ति होती है, जिसके गर्दन की के चारों ओर घंटियां होती है और ऐसा लगता है की वह शिव लिंग को गहराई से देख रहा है

आध्यात्मिक साधक मानते हैं की नंदी एक आदर्श मध्यस्थ है और वह वर्षों से शिव मंदिर के गर्भ के बाहर धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा कर अनन्त प्रतीक्षा की गुणवत्ता का प्रतिनिधित्व करता है

मानव रूपी नंदी की मुर्तिया केवल दक्षिण भारत के शिव मंदिरों के द्वार पर पाई जाती है

नंदी आठ सिद्धों के मुख्य गुरु थे, जिन्हें शैववाद के ज्ञान के प्रसार के लिए अलग-अलग दिशाओं में भेजा गया था।

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