अक्‍साई चिन और तवांग को लेकर भारत और चीन के बीच हाेने वाले संभावित समझौते को लेकर चीन का मकसद कुछ और ही है। चीन ने संकेत दिए हैं कि अगर भारत उसे अरुणाचल का तवांग वाला हिस्सा लौटा दे, तो वह अक्साई चिन पर कब्जा छोड़ सकता है। चीन के एक पूर्व शीर्ष अधिकारी ने भारत-चीन सीमा विवाद निपटारे के मसले पर पहली बार परोक्ष रूप से अपनी बात रखी है। उन्‍होंने कहा है कि अरुणाचल प्रदेश का तवांग, तिब्‍बत का एक अभिन्‍न हिस्‍सा है. ऐसे में तब तक सीमा विवाद को नहीं सुलझाया जा सकता जब त‍क कि पूर्वी क्षेत्र में भारत कोई रियायत देने पर सहमत नहीं होता।  इस पूर्व शीर्ष अधिकारी के मुताबिक यदि भारत ऐसा करता है तो अक्‍साई चिन क्षेत्र में चीन, भारत को रियायत दे सकता है।

ऐसा पहली बार नहीं है, जब चीन की ओर से इस तरह की ‘पेशकश’ की गई है। अरुणाचल प्रदेश के प्रसिद्ध बौद्ध स्थल तवांग के बदले चीन पूर्वी क्षेत्र में ‘लेन-देन’ का ऑफर इससे पहले भी कई बार दे चुका है। 2007 में सीमा विवाद सुलझाने के लिए वर्किंग ग्रुप की घोषणा के ठीक बाद चीन ने यही पेशकश की थी, जिससे पूरी बातचीत खटाई में पड़ गई थी। वहीं भारत का तिब्‍बत के मुद्दे पर नरम रुख चीन के लिए हमेशा से ही परेशानी का सबब बनता रहा है। ऐसे में भारत यदि चीन के प्रस्‍ताव को मान लेता है तो सबसे बड़े मठ उसके अधिकार क्षेत्र में आ जाएगा, जिसके बाद उसका तिब्‍बत पर नियंत्रण काफी कुछ सरल हो जाएगा।

चीन अरुणाचल को तिब्बत से अलग करने वाली मैकमोहन रेखा को नहीं मानता है। भारत और चीन के बीच पिछले 32 सालों में विभिन्न स्तरों पर दो दर्जन से अधिक बैठकें हुई हैं और इन सभी बैठकों में चीन तवांग को अपना हिस्सा बताता रहा है। यहां पर ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि तवांग में बौद्ध भिक्षुओं का सबसे बड़ा मठ है और चूंकि तिब्‍बत इसको लेकर हमेशा से ही संवेदनशील रहा है और वहां से मिले आदेश का पालन भी करता रहा है, लिहाजा यहां से तिब्‍बत को साधना उसके लिए मुश्किल नहीं रहेगा।

तवांग पर आखिर इतना क्यों मरता है चीन?

तवांग भारत चीन सीमा के पूर्वी सेक्टर का सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इलाका है। तवांग के पश्चिम में भूटान और उत्तर में तिब्बत है। 1962 में चीनी सेना ने तवांग पर कब्जा करने के बाद उसे खाली कर दिया था, क्योंकि वह मैकमोहन रेखा के अंदर पड़ता था। लेकिन इसके बाद से चीन तवांग पर यह कहते हुए अपना हक जताता रहा है कि वह मैकमोहन रेखा को नहीं मानता। चीन तवांग को दक्षिणी तिब्बत कहता है, क्योंकि 15वीं शताब्दी के दलाई लामा का यहां जन्म हुआ था। चीन तवांग पर अधिकार कर तिब्बती बौद्ध केंद्रों पर उसकी पकड़ और मजबूत करना चाहता है। सामरिक नजरिए से तवांग को चीन को देना भी भारत के लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

क्या पाकिस्‍तान बन सकता है सबसे बड़ी रुकावट-

अक्‍साई चिन और तवांग को लेकर भविष्‍य में चीन और भारत के बीच होने वाले समझौते में पाकिस्‍तान एक सबसे बड़ी रुकावट बन सकता है। इसका कारण अक्‍साई चिन का वह क्षेत्र है जो सीधे तौर पर पाकिस्‍तान से मिलता है। इसकी एक बड़ी वजह चीन और पाकिस्‍तान के बीच बन रहा आर्थिक कॉरिडोर भी है। इस पर चीन काफी पैसा खर्च कर रहा है। इसके जरिए चीन अपना बाजार बढ़ाना चाहता है और साथ ही वह पूर्व के सिल्‍क रूट को दोबारा उजागर करना चाहता है। जम्‍मू कश्‍मीर पर पाकिस्‍तान के रुख से पूरी दुनिया अच्‍छे से परिचित है। यही वजह है कि वह इस समझौते को कभी मंजूर नहीं करेगा। इसकी एक बड़ी वजह यह भी होगी कि इस समझौते के बाद पाकिस्‍तान पर पीओके को छोड़ने का दबाव बढ़ जाएगा, साथ ही चीन के दूर होने से वह सामरिक दृष्टि से कमजोर हो जाएगा।

कोई सौदेबाजी नहीं चाहेगा भारत-

भारत और चीन ने 2005 में सीमा मसले के हल के लिए राजनीतिक निर्देशक सिद्धांत घोषित किए थे। इसके अनुरूप दोनों देश सीमा मसले के हल के लिए एक-दूसरे की बसी हुई आबादी और रिहायशी इलाकों की भावनाओं के अनुरूप ही बातचीत करेंगे। तब भारत की ओर से यह सोचा गया था कि चूंकि तवांग के इलाके में भारत समर्थक आबादी रहती है और वे कभी भी तिब्बत में नहीं शामिल होना चाहेंगे, इसलिए तवांग को लेकर भारत को कोई सौदेबाजी नहीं करनी होगी।

 

दूसरी ओर, अक्‍साई चिन पर चीन का कब्‍जा हमेशा से ही भारत के लिए परेशानी का सबब बनता रहा है। ऐसे में यदि चीन और भारत इस समझाैते पर आगे बढ़ते हैं तो निश्चित तौर पर ही यह भारत के लिए फायदेमंद साबित होगा। फायदेमंद इसलिए भी होगा क्‍योंकि अक्‍साई चिन भारत की सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्‍वपूर्ण है। ऐसा इसलिए भी है कि क्‍योंकि भारत की आजादी के कुछ वर्षों बाद से ही इस क्षेत्र पर चीन ने कब्‍जा जमा लिया था। 1950 के दशक से यह क्षेत्र चीन कब्‍जे में है पर भारत इस पर अपना दावा जताता है और इसे जम्मू और कश्मीर राज्य का उत्तर पूर्वी हिस्सा मानता है। अक्साई चिन जम्मू और कश्मीर के कुल क्षेत्रफल के पांचवें भाग के बराबर है। चीन ने इसे प्रशासनिक रूप से शिनजियांग प्रांत के काश्गर विभाग के कार्गिलिक जिने का हिस्सा बनाया है।

तीन हिस्सों में बंटी है भारत-चीन सीमा-

भारत और चीन के बीच चार हजार किलोमीटर से अधिक लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पूर्वी, मध्य और पश्चिमी हिस्सों में बंटी हुई है। पूर्वी क्षेत्र में अरुणाचल प्रदेश का इलाका पड़ता है जिसके 90 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके पर चीन ने अपना कब्जा जताया है। मध्य क्षेत्र में उत्तराखंड, हिमाचल और सिक्किम हैं। इस इलाके में भी उत्तराखंड के बाराहुती क्षेत्र पर चीन दावा जता रहा है।

रेशम मार्ग से जोड़ने का जरिया रहा है अक्‍साई चिन-

अक्साई चिन कुनलुन पर्वतों के ठीक नीचे स्थित है। ऐतिहासिक रूप से अक्साई चिन भारत को रेशम मार्ग से जोड़ने का जरिया रहा है। भारत से तुर्किस्तान का व्यापार मार्ग लद्दाख़ और अक्साई चिन के रस्ते से होते हुए काश्गर शहर जाया करता था। इतना ही नहीं पूर्व में यह मध्य एशिया के पूर्वी इलाकों और भारत के बीच संस्कृति, भाषा और व्यापार का रास्ता रहा है। दरअसल, चीन ने जब 1950 के दशक में जब तिब्बत पर कब्जा किया तो वहां के कुछ हिस्‍सों में इसको लेकर विद्रोह भड़क गया। इसकी वजह से चीन और तिब्बत के बीच के मार्ग कट जाने का खतरा बन गया था। इसके समस्‍या के हल के तौर पर चीन ने शिंजियांग-तिब्बत राजमार्ग का निर्माण किया। यह मार्ग अक्साई चिन से निकलता है और चीन को पश्चिमी तिब्बत से जोड़ता था।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है अक्साई चिन?

अक्साई चिन कश्मीर का हिस्सा रहा है, इसलिए कश्मीर के भारत में विलय के बाद यह इलाका भी भारत का होगा। लेकिन चीन ने अक्साई चिन को अपने शिनच्यांग प्रदेश का इलाका बताया है। भारत का कहना है कि चीन ने 1962 की लड़ाई में अक्साई चिन के 38 हजार वर्ग मील इलाके पर कब्जा कर लिया था। अक्साई चिन का यह इलाका वीरान और बर्फीला है जिसे लेकर भारत उतना चिंतित नहीं है, लेकिन चीन कहता है कि इसका कुछ हिस्सा वह भारत को दे सकता है।

इतना ही नहीं पूरे जम्‍मू कश्‍मीर की यदि बात की जाए तो मौजूदा हालात में इसके तीन हिस्‍सों पर अलग-अलग देशों का कब्‍जा है। इसमें जहां एक हिस्‍सा जिसको पीओके के नाम से जाना जाता है वह पाकिस्‍तान के कब्‍जे में हैं, वहीं एक हिस्‍सा भारत के पास है और उत्‍तरी हिस्‍से पर चीन का कब्‍जा है। सामरिक दृष्टि से यह काफी महत्‍वपूर्ण इसलिए भी है क्‍योंकि पीओके का भी कुछ हिस्‍सा इससे मिलता है जो पाकिस्‍तान ने चीन को सौंप रखा है। इतना ही नहीं चीन और पाकिस्‍तान के बीच बनने वाले आर्थिक कॉरिडाेर का भी रास्‍ता यहीं से निकल कर जाता है। इस लिहाज से भी यह पूरा क्षेत्र भारत के लिए अति महत्‍वपूर्ण है।

अक्साई चिन का क्षेत्रफल 42,685 स्‍क्‍वायर किमी है। भौगोलिक दृष्टि से अक्साई चिन तिब्बती पठार का भाग है और जिसे खारा मैदान भी कहा जाता है। इसकी वजह यह भी है क्‍योंकि यहां पर लोगों की बस्तियां नहीं है। इस क्षेत्र मे अक्साई चिन के नाम की झील और एक नदी है। यहां वर्षा और हिमपात ना के बराबर होता है क्योंकि हिमालय और अन्य पर्वत भारतीय मानसूनी हवाओं को यहां आने से रोक देते हैं।

तवांग में स्थित है एशिया का सबसे बड़ा वौद्ध मठ-

तवांग मठ भारत का सबसे बड़ा और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा मठ है। इसकी स्थापना मेराक लामा लोड्रे ने 1860- 1861 में की थी। तवांग की उत्तर-पूर्व दिशा में तिब्बत, दक्षिण-पश्चिम में भूटान और दक्षिण-पूर्व में पश्चिम कमेंग स्थित है। तवांग हिमालय की तराई में समुद्र तल से 3500 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर मोनपा जाति के आदिवासी रहते हैं। यह जाति मंगोलों से संबंधित है। इस मठ का मुख्य आकर्षण भगवान् बुद्ध की 28 फ़ीट ऊँची प्रतिमा और प्रभावशाली तीन तल्ला सदन है।
एक मान्यता के अनुसार मठ बनाने के लिए इस स्थान का चयन एक घोड़े ने किया था।  “ता” का अर्थ होता है “घोडा”, और “वांग” का अर्थ होता है “आशीर्वाद दिया हुआ”, चूँकि इस स्थान को दिव्य घोड़े ने अपना आशीर्वाद दिया था इसलिए इसका नाम तवांग पड़ा।

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