गोरखपुर में पिछले 8 चुनाव से भगवा लहरा रहा था। चाहे महंत अवैद्यनाथ ने हिन्दू महासभा के टिकट पर चुनाव जीता हो या फिर बीजेपी के टिकट पर। तीन बार महंत सांसद बने। उनके बाद मठ के वारिस बने योगी आदित्यनाथ ने इस सीट पर कब्जा जमाया और लगातार 5 बार से सांसद रहे। ऐसी ही सीट को कहते हैं अपराजेय सीट। मगर, ऐसा क्या हुआ कि गोरखपुर जैसी सीट भी बीजेपी ने खो दी और वो भी तब जबकि राज्य से लेकर  केन्द्र तक बीजेपी की ही सरकार है। खुद सीएम हैं योगी आदित्यनाथ। क्या कारण रहे, ऐसा क्या हुआ? आइए हम आपको बताते हैं इस हार के सबसे प्रमुख कारण…

बुआ-टीपू का  गठजोड़

जैसा कि खुद योगी आदित्यनाथ ने चुनाव परिणाम आने के बाद कहा है कि उन्हें माया की चाल का पता नहीं था। समझने में चूक हो गयी। माया-अखिलेश के बीच मतदान से कुछ दिन पहले हुआ यह गठजोड़ अचानक था, बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं थी। एसपी-बीएसपी के जातीय वोट बैंक के एकजुट हो जाने के बाद जो फिजां बन रही थी, उसे बीजेपी नेता भांप नहीं पाए।

सपा का निषाद पार्टी के प्रवीण निषाद को टिकट देना

अखिलेश यादव ने यह ऐसी चाल चली थी जो बीएसपी से तालमेल से पहले चली गयी दूरदर्शितापूर्ण चाल थी। निषाद पार्टी योगी आदित्यनाथ के खिलाफ लगातार चुनाव लड़ती रही थी। एक तरह से एसपी ने निषाद पार्टी का समर्थन कर दिया या यूं कहें कि निषाद पार्टी से समर्थन ले लिया। कीमत एक उम्मीदवार को टिकट देने की रही। निषाद वोट+एसपी+बीएसपी के वोट भले ही गणितीय तौर पर एक साथ होने के बाद भी योगी आदित्यनाथ को हराने लायक नहीं बनते थे। मगर, योगी आदित्यनाथ और किसी दूसरे उम्मीदवार में बड़ा फर्क होता है।

बीजेपी द्वारा मंदिर से जुड़े व्यक्ति के बजाय ब्राह्मण उम्मीदवार को उतारना

गोरखपुर की सियासत में ब्राह्मण और राजपूत एक साथ वोट करते नहीं देखे गये हैं। बीजेपी ने इस प्रयोग को आजमाया। शिव प्रताप शुक्ला के रिश्तेदार उपेन्द्र शुक्ला को टिकट दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि उम्मीदवार कमजोर नहीं था, बल्कि इस उम्मीदवार के लिए बीजेपी की पूरी ताकत एकजुट नहीं हो सकी।

योगी का ईद वाला बयान

विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री का ईद नहीं मनाने वाला बयान देना। यह ऐसा बयान था जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। इसने मुससलमानों का ध्रुवीकरण किया। जो मुसलमान नरेंद्र मोदी के नाम पर या फिर ट्रिपल तलाक की वजह से बीजेपी को वोट दे सकते थे, उन्होंने अपना मन बदल लिया। 10 फीसदी मुसलमान मतदाताओं ने एकतरफा मतदान किया। इस बयान ने फूलपुर में भी नुकसान पहुंचाया।

12 फीसदी कम मतदान

मतदान में 12 फीसदी कमी होना कोई छोटी घटना नहीं होती। यह कमी गोरखपुर में मुसलमान मतदाताओं से भी ज्यादा हुई जो 10 फीसदी हैं। एसपी उम्मीदवार की जीत महज 21 हजार वोटों से हुई। अगर कार्यकर्ताओ में उत्साह होता, तो वोट फीसदी कम कतई नहीं होता।

योगी और बीजेपी का अति आत्मविश्वास

योगी आदित्यनाथ अगर कह रहे हैं कि वे एसपी-बीएसपी की चाल नहीं समझ सके, तो इसकी वजह उनका अति आत्मविश्वास ही कहा जाएगा। कम वोट होने का नुकसान बीजेपी को ज्यादा इसलिए हुआ क्योंकि बीजेपी के वोटर मतदान केन्द्रों तक नहीं पहुंचे। विधानसभा चुनावों में एसपी-बीएसपी के सम्मिलित वोट बीजेपी को मिले वोटों से 76 हज़ार अधिक थे। फिर भी एसपी महज 21 हज़ार वोटों से ही जीती है। योगी आदित्यनाथ ने एसपी-बीएसपी के एकजुट होने का मतलब वक्त रहते समझ लिया होता तो इस हार को वे जीत में बदल सकते थे।

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