वृंदावन में बांके बिहारी के अलावा और क्या है खास- पढ़ें


वृंदावन में श्रृद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र यही बांके बिहारी मंदिर है। वृंदावन में ही भगवान श्रीकृष्ण ने अपना बचपन गुजारा। बांके बिहारी मंदिर देश के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। बांके बिहारी कृष्ण का ही एक रूप है। इस मंदिर का निर्माण 1864 में स्वामी हरिदास ने करवाया था।

 

 

वृंदावन में करीब 5000 मंदिर हैं। जन्माष्टमी, होली और राधाष्टमी में पूरे वृंदावन की छटा देखने लायक होती है। समय के साथ यहां के कई मंदिर नष्ट हो गए। वर्ष 1515 में चैतन्य महाप्रभु ने यहां के कई मंदिरों की खोज की। तब जाकर यह स्थान एक बार फिर सबके सामने आया। यहां के प्रमुख मंदिरों में एक दिन में दर्शन किए जा सकते हैं।

 

श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में केवल शरद पूर्णिमा के दिन वंशीधारण करते हैं। केवल श्रावन तीज के दिन ही ठाकुर जी झूले पर बैठते हैं। जन्माष्टमी के दिन ही केवल उनकी मंगला–आरती होती है, जिसके दर्शन सौभाग्य से ही होते हैं। चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया के दिन ही होता है।

 

बांके बिहारी होली

ठाकुर जी के दर्शन प्रातः 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक एवं सायं 6 बजे से रात्रि 9 बजे तक होते हैं। विशेष तिथि उपलक्ष्यानुसार समय के परिवर्तन कर दिया जाता हैं। यहां दर्शन करने जाएं तो समय का विशेष ध्यान रखें। यहां की होली का अपना ही आनंद है।

 

पागल बाबा मंदिर, प्रेम मंदिर

वृंदावन आने पर प्रेम मंदिर नहीं गए तो आप सच में बहुत कुछ मिस करेंगे। भक्ति और प्रेम का यह अनूठा मंदिर वृंदावन के पास 54 एकड़ जमीन में बनाया गया है। इस मंदिर को पांचवें जगतगुरु श्री कृपालुजी महाराज ने बनवाया था। इस मंदिर को गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर बनाया गया है।

 

प्रेम मंदिर

प्रेम मंदिर को 1000 श्रमिकों ने दिन-रात काम कर 11 साल में बनाया था। इसे बनाने के लिए देशभर के बेहतरीन कारीगरों को बुलाया गया था। इस पूरे मंदिर को बेहतरीन क्वालिटी के संगमरमर से बनाया गया है। रात में इस मंदिर चमक आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। यह फोटो तो बस एक बानगी है।

 

गोवेर्धन

प्रेम मंदिर की लंबाई 185 फीट जबकि 135 फीट चौड़ाई है। इस मंदिर में दक्षिण भारतीय संस्कृति की भी झलक दिखती है। इस भव्य मंदिर का डिजायन तैयार किया है गुजरात के सुमन राय त्रिवेदी ने। मंदिर में कृष्ण की बाल लीलाओं को दर्शाती कई मूर्तियां हैं। उन्हीं में से एक यह दृश्य भी है, जिसमें कृष्ण अपनी एक अंगुली (कनिष्ठिका) पर गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों की रक्षा करते हैं।

 

कृष्ण

12 जनवरी 2001 में प्रेम मंदिर को बनाना शुरू किया गया था, जो 15 फरवरी 2012 को बनकर तैयार हो सका। बताया जाता है मंदिर बनाने में 150 करोड़ रुपए लग गए। इस मंदिर में एक बार में 25000 लोग बैठ सकते हैं। इसे बनाने में 30000 टन इटैलियन मार्बल का इस्तेमाल किया गया है। इसमें कई आकर्षक मूर्तियां हैं।

 

वृन्दावन, श्वेत मंदिर, प्रेम मंदिर

वृन्दावन के रमन रेती इलाके में स्थित यह इस्कॉन मंदिर अंग्रेजों का मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। इस्कॉन (ISKCON – International Society for Krishna Consciousness) – कृष्ण जागरण के लिये अंतर्राष्ट्रीय संस्था का छोटा नाम है जिसकी स्थापना स्वामी प्रभुपाद जी ने की थी।

 

यह मंदिर 1975 में राम नवमी के दिन बनाना शुरू किया गया था। मान्यता है कि कृष्ण और बलराम अपनी गायों के साथ यहीं यमुना नदी के किनारे आते थे।

 

ISKON वृन्दावन

केसरिया वस्त्रों में हरे रामा–हरे कृष्णा की धुन में तमाम विदेशी महिला–पुरुष यहाँ देखे जाते हैं और उन्हीं की उपस्थिति की वज़ह से इस मंदिर को अंग्रजों के मन्दिर का नाम मिला। इसमें राधा कृष्ण की भव्य एवं काफी सुन्दर मूर्तियां हैं। इस मंदिर में तीन मुख्य मूर्तियां हैं। पहली है गौरा निताई जी की, दूसरी है कृष्ण और बलराम की। तीसरी मूर्ति है राधाश्याम सुंदर की अपनी गोपियों के साथ।

 

महा रास, राधा कृष्ण

सेवा कुंज और निधिवन के बारे में बताते हैं कि यहीं पर श्रीकृष्ण राधा और अन्य गोपियों के साथ रासलीला करती थीं। इस जगह की हरियाली देखने लायक है। यहां राधा-कृष्ण का आकर्षक मंदिर है।

श्री राधा दामोदर मंदिर, radha damodar mandir

श्री राधा दामोदर मंदिर माधव गौड़ीय सम्प्रदाय द्वारा स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। 1542 में श्रीला जीवा गोस्वामी ने इस मंदिर को बनवाया था। यह प्राचीन मंदिर भी यहां श्रृद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

 

madan mohan mandir, मदन मोहन मंदिर मथुरा

मदन मोहन (कृष्ण) मंदिर वृंदावन का सबसे पुराना मंदिर है। इसे 1580 में मुल्तान के राम दास कपूर ने यमुना किनारे बनवाया था। 60 फुट ऊंचा यह मंदिर अपने आप में इतिहास समेटे हुए है।

महादेव वृन्दावन

वृन्दावन स्थित इस प्राचीन गोपेश्वर महादेव मन्दिर की बहुत मान्यता है। कहा जाता है कि जब शंकर जी की इच्छा भगवान की रासलीला देखने की हुए तो वे गोपी का रूप धारण कर वृन्दावन आये। उसी स्मृति में यह शिव मन्दिर बना है।


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