महात्मा गांधी की अंतरंग सहयात्री की हाल ही में मिली डायरी बताती है कि ब्रह्मचर्य को लेकर किए गए उनके प्रयोग ने मनुबेन के जीवन को कैसे बदल डाला.

वह भारतीय इतिहास का एक जाना-पहचाना चेहरा है जो आखिरी दो साल में ‘सहारा’ बनकर साये की तरह महात्मा गांधी के साथ रही. फिर भी यह चेहरा लोगों के लिए एक पहेली है. 1946 में सिर्फ 17 वर्ष की आयु में यह महिला महात्मा की पर्सनल असिस्टेंट बनीं और उनकी हत्या होने तक लगातार उनके साथ रही. फिर भी मनुबेन के नाम से मशहूर मृदुला गांधी ने 40 वर्ष की उम्र में अविवाहित रहते हुए दिल्ली में गुमनामी में दम तोड़ा.

1982 में रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी में मनुबेन किरदार को सुप्रिया पाठक ने निभाया था. मनुबेन के निधन के चार दशक के बाद उनकी दस डायरियां इंडिया टुडे को देखने को मिलीं. गुजराती में लिखी गई और 2,000 पन्नों में फैली इन डायरियों की शुरुआत 11 अप्रैल, 1943 से होती है. गुजराती विद्वान रिजवान कादरी ने इन डायरियों का विस्तार से अध्ययन किया. इनसे पता चलता है कि अपनी सेक्सुअलिटी के साथ गांधी के प्रयोगों का मनुबेन के मन पर क्या असर पड़ा. इनसे गांधी के संपर्क में रहने वाले लोगों के मन में पनपती ईर्ष्या और क्रोध की भावना भी उजागर होती है. इनमें अधिकतर युवा महिलाएं थीं. डायरियों का लेखन उस समय शुरू हुआ जब गांधी के भाई की पोती मनुबेन पुणे में आगा खां पैलेस में नजरबंद गांधी की पत्नी कस्तूरबा की सेवा करने आई थीं. गांधी और कस्तूरबा को 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इस पैलेस में नजरबंद रखा गया था. बीमारी के अंतिम दिनों में मनुबेन ने कस्तूरबा की सेवा की. 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गोडसे ने मनुबेन को एक तरफ धकेल कर अपनी 9 एमएम बरेटा पिस्तौल से गांधी पर तीन गोलियां दागी थीं. उसके 22 दिन बाद मनुबेन ने डायरी लिखना बंद कर दिया.

डायरियों में जगह-जगह हाशिये पर गांधी के हस्ताक्षर हैं. इनसे उनके प्रति समर्पित एक लड़की की छवि उभरती है. 28 दिसंबर,1946 को बिहार के श्रीरामपुर में दर्ज प्रविष्टि में मनुबेन ने लिखा है, ‘‘बापू मेरी माता हैं. वे ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के माध्यम से मुझे ऊंचे मानवीय फलक पर ले जा रहे हैं. ये प्रयोग चरित्र निर्माण के उनके महायज्ञ के अंग हैं. इनके बारे में कोई भी उलटी-सीधी बात सबसे निंदनीय है.’’ इससे नौ दिन पहले ही मनुबेन गांधी के साथ आईं थीं. उस समय 77 वर्षीय गांधी तत्कालीन पूर्वी बंगाल में नोआखली में हुई हत्याओं के बाद अशांत गांवों में घूम रहे थे. गांधी के सचिव प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक महात्मा गांधी: द लास्ट फेज में इस बात की पुष्टि करते हुए लिखा है, ‘‘उन्होंने उसके लिए वह सब कुछ किया जो एक मां अपनी बेटी के लिए करती है. उसकी पढ़ाई, उसके भोजन, पोशाक, आराम और नींद हर बात का वे ख्याल रखते थे. करीब से देख-रेख और मार्गदर्शन के लिए गांधी उसे अपने ही बिस्तर पर सुलाते थे. मन से मासूम किसी लड़की को अपनी मां के साथ सोने में कभी शर्म नहीं आती.’’ मनुबेन गांधी की प्रमुख निजी सेविका थीं. वे मालिश और नहलाने से लेकर उनका खाना पकाने तक सारे काम करती थीं.
इन डायरियों में डॉ. सुशीला नय्यर जैसी महात्मा गांधी की महिला सहयोगियों के जीवन का भी विस्तार से वर्णन है. प्यारेलाल की बहन सुशीला गांधी की निजी चिकित्सक थीं जो बाद में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनीं. उनके अलावा पंजाबी मुस्लिम महिला बीबी अम्तुस्सलाम भी इन महिलाओं में शामिल थीं. ब्रह्मचर्य के महात्मा के प्रयोगों में शामिल रहीं महिलाओं के बीच जबरदस्त जलन की झलक भी इन डायरियों में मौजूद है. मनुबेन ने 24 फरवरी, 1947 को बिहार के हेमचर में अपनी डायरी में दर्ज किया, ‘‘आज बापू ने अम्तुस्सलाम बेन को एक कड़ा पत्र लिखकर कहा कि उनका जो पत्र मिला है उससे जाहिर होता है कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग उनके साथ शुरू न होने से वे कुछ नाराज हैं.’’

2010 में दिल्ली में राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिलीं इन डायरियों में यह भी लिखा है कि 47 वर्ष की आयु में भी प्यारेलाल मनुबेन से शादी करने को लालायित थे और सुशीला इसके लिए दबाव डाल रही थीं. 2 फरवरी, 1947 को बिहार के दशधरिया में आखिरकार मनुबेन को लिखना ही पड़ा, ‘‘मैं प्यारेलालजी को अपने बड़े भाई की तरह मानती हूं, इसके अलावा कुछ भी नहीं. जिस दिन मैं अपने गुरु, अपने बड़े भाई या अपने दादा से शादी करने का फैसला कर लूंगी, उस दिन उनसे विवाह कर लूंगी. इस बारे में मुझ पर और दबाव मत डालना.’’

मनुबेन की टिप्पणियों से ब्रह्मचर्य के प्रयोगों को लेकर गांधी के अनुयायियों में बढ़ते असंतोष की झलक भी मिलती है. 31 जनवरी, 1947 को बिहार के नवग्राम में दर्ज प्रविष्टि में मनुबेन ने घनिष्ठ अनुयायी किशोरलाल मशरूवाला के गांधी को लिखे पत्र का उल्लेख किया है, जिसमें उन्होंने मनु को ‘‘माया’’ बताते हुए महात्मा से उसके चंगुल से मुक्त होने का आग्रह किया था. इस पर गांधी का जवाब था: ‘‘तुम जो चाहे करो लेकिन इस प्रयोग के बारे में मेरी आस्था अटल है.’’ मनुबेन और गांधी जब बंगाल में नोआखली की यात्रा कर रहे थे तब उनके दो सचिव आर.पी. परशुराम और निर्मल कुमार बोस गांधी के आचरण से नाराज होकर उनका साथ छोड़ गए थे. यही निर्मल कुमार बोस बाद में भारत की ऐंथ्रोपोलॉजिकल सोसायटी के डायरेक्टर बने. सरदार वल्लभभाई पटेल ने 25 जनवरी, 1947 को लिखे एक पत्र में गांधी से कहा था कि वे यह प्रयोग रोक दें. पटेल ने इसे गांधी की ‘भयंकर भूल’ बताया था जिससे उनके अनुयायियों को ‘गहरी पीड़ा’ होती थी. यह पत्र राष्ट्रीय अभिलेखागार में सरदार पटेल के दस्तावेजों में शामिल है. महात्मा ने मनुबेन के मन पर कितनी गहरी छाप छोड़ी थी, इसकी जबरदस्त झलक 19 अगस्त,1955 को जवाहर लाल नेहरू के नाम लिखे गए मोरारजी देसाई के पत्र से मिलती है. मनुबेन एक ‘‘अज्ञात रोग’’ के इलाज के लिए बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती थीं. वहां अगस्त में उनसे मिलने के बाद मोरारजी देसाई ने लिखा: ‘‘मनु की समस्या शरीर से अधिक मन की है. लगता है, वे जीवन से हार गई हैं और सभी प्रकार की दवाओं से उन्हें एलर्जी हो गई है.’’

30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिरला हाउस में शाम 5:17 बजे जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा को गोली मारी, उस समय मनुबेन के अलावा आभाबेन गांधी भी महात्मा की बगल में थीं. आभा उनके भतीजे कनु गांधी की पत्नी थीं. अगले दिन मनुबेन ने लिखा, ‘‘जब चिता की लपटें बापू की देह को निगल रही थीं, मैं अंतिम संस्कार के बाद बहुत देर तक वहां बैठी रहना चाहती थी. सरदार पटेल ने मुझे ढाढस बंधाया और अपने घर ले गए. मेरे लिए वह सब अकल्पनीय था. दो दिन पहले तक बापू हमारे साथ थे. कल तक कम-से-कम उनका शरीर तो था और आज मैं एकदम अकेली हूं. मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है.’’

उसके बाद डायरी में अगली और अंतिम प्रविष्टि 21 फरवरी, 1948 की है, जब मनुबेन दिल्ली से ट्रेन में बैठकर भावनगर के निकट महुवा के लिए रवाना हुईं. इसमें उन्होंने लिखा, ‘‘आज मैंने दिल्ली छोड़ दी.’’ मनुबेन ने गांधी के निधन के बाद पांच पुस्तकें लिखीं. इनमें से एक लास्ट ग्लिम्प्सिज ऑफ बापू में उन्होंने लिखा, ‘‘काका (गांधी के सबसे छोटे बेटे देवदास) ने मुझे चेताया कि अपनी डायरी में लिखी गई बातें किसी को न बताऊं और महत्वपूर्ण पत्रों में लिखी गई बातों की जानकारी भी न दूं. उन्होंने कहा था, तुम अभी बहुत छोटी हो पर तुम्हारे पास बहुत कीमती साहित्य है और तुम अभी परिपक्व भी नहीं हो.’’

बापू: माय मदर नाम से अपने 68 पन्नों के संस्मरण में भी मनुबेन ने गांधी के साथ उनकी सेक्सुअलिटी के प्रयोगों में शामिल रहने के बावजूद उनके बारे में अपनी भावनाओं का कहीं उल्लेख नहीं किया. पुस्तक के 15 अध्यायों में से एक में मनुबेन ने लिखा है कि उनके पुणे जाने के 10 महीने के भीतर कस्तूरबा की मृत्यु हो गई. उसके बाद बापू ने मौन व्रत धारण कर लिया और वे सिर्फ लिखकर ही अपनी बात कहते थे. कुछ ही दिन बाद उन्हें बापू से एक बहुत ही मार्मिक नोट मिला, जिसमें उन्होंने उन्हें राजकोट जाकर अपनी पढ़ाई फिर शुरू करने की सलाह दी थी. इस अध्याय में मनुबेन ने लिखा, ‘‘उस दिन से बापू मेरी माता बन गए.’’

किशोरी मनुबेन ने कराची में पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी जहां उनके पिता, गांधी के भतीजे जयसुखलाल सिंधिया स्टीम नैविगेशन कंपनी में काम करते थे. पुणे आने से कुछ दिन पहले ही मनु ने अपनी मां को खोया था इसलिए उन्हें भी मां रूपी सहारे की जरूरत थी.

मनुबेन ने अपने जीवन के अंतिम साल एकदम अकेले काटे. गांधी की हत्या के बाद करीब 21 वर्ष तक वे गुजरात में भावनगर के निकट महुवा में रहीं. वे बच्चों का एक स्कूल चलाती थीं और महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने भगिनी समाज की स्थापना भी की थी. जीवन के अंतिम चरण में मनुबेन की एक सहयोगी भानुबेन लाहिड़ी भी स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार की थीं. समाज की 22 महिला सदस्यों में से एक लाहिड़ी को याद है कि गांधी ने मनु के जीवन पर कितना गहरा असर डाला था. उनका कहना है कि एक बार जब मनुबेन ने अपने एक गरीब अनुयायी के विवाह के लिए उनसे चुनरी ली तो बोल पड़ीं, ‘‘मैं तो खुद को मीरा बाई मानती हूं जो सिर्फ अपने ‘यामलो (कृष्ण) के लिए जीती रही.’’

मनोविश्लेषक और स्कॉलर सुधीर कक्कड़ इन डायरियों के बारे में कहते हैं, ‘‘इन प्रयोगों के दौरान महात्मा गांधी अपनी भावनाओं पर इतने अधिक केंद्रित हो गए थे कि मुझे लगता है कि उन्होंने इन प्रयोगों में शामिल महिलाओं पर उनके प्रभाव को अनदेखा करने का फैसला लिया होगा.

विभिन्न महिलाओं के बीच जलन की लपटें उठने के अलावा हमें नहीं मालूम कि इन प्रयोगों ने उनमें से हर महिला के मन पर कोई प्रभाव डाला था या नहीं.’’

अब मनुबेन की डायरियां मिलने से हम कम से कम यह अंदाजा तो लगा ही सकते हैं कि महात्मा ने अपनी इन सहयोगियों के मन पर किस तरह की छाप छोड़ी थी या इन प्रयोगों का उन पर क्या असर हुआ था.

मधुबेन की डायरियां कैसे जगजाहिर हुईं

1. 1969 मनुबेन के निधन तक उनकी डायरियां में महुवा में उनके पास थीं. उन्होंने अपने पिता जयसुखलाल से कहा था कि डायरियां उनकी बहन संयुक्ताबेन की बेटी मीना जैन को सौंप दी जाएं.

2. मुंबई निवासी मीना जैन ने उन्हें मध्य प्रदेश में रीवा में अपने पारिवारिक बंगले में रखने का फैसला किया.

3. 2010 में मीना की बचपन की सहेली वर्षा दास जो उस समय दिल्ली में राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय की निदेशक थीं, मीना के अनुरोध पर रीवा गईं और डायरियां दिल्ली लाकर राष्ट्रीय अभिलेखागार में जमा करवा दीं.

बड़े-बड़े खिलाड़ी
मनुबेन की डायरी में दर्ज नाटकीय शख्स

प्यारेलाल
(1899-1982)
बाद के वर्षों में गांधी के निजी सचिव रहे.

सुशीला नय्यर
(1914-2000)
प्यारेलाल की छोटी बहन जो गांधी की निजी चिकित्सक थीं और बाद में दो बार केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहीं.

मृदुला गांधी उर्फ मनुबेन
(1929-1969)
गांधी के भाई की पोती और अंतिम दो साल में उनके साथ रहीं.

कनु गांधी
(1917-1986)
गांधी के भतीजे जो उनके निजी फोटोग्राफर रहे.

देवदास गांधी
(1900-1957)
गांधी के सबसे छोटे बेटे. 1950 के दशक के प्रख्यात पत्रकार.

आभा गांधी
(1927-1995)
मनुबेन के अलावा गांधी की दूसरी निकटतम सहयोगी और उनके भतीजे कनु की पत्नी.

बीबी अम्तुस्सलाम
(1958 में निधन)
गांधी की पंजाबी मुस्लिम अनुयायी.

किशोरलाल मशरूवाला
(1890-1952)
गांधी के निकट सहयोगी थे.

अमृतलाल ठक्कर
(1869-1951)
ठक्कर बापा के नाम से मशहूर समाजसेवी जो गांधी और गोपाल कृष्ण गोखले के सहयोगी रहे.

Source – AAJTAK

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