दस महीने की उम्र में दिमागी बुखार मेनेन्जाइटिस से पीड़ित होने के कारण जॉर्ज अब्राहम की ऑप्टिक नर्व और रेटिना खराब होने से वह दृष्टिहीन हो गए. हालांकि आज उनकी जिंदगी अन्य दृष्टिहीनों से बेहद अलग है.आज जॉर्ज अब्राहम एक मोटिवेशनल स्पीकर, ट्रेनर और कम्युनिकेटर हैं और दृष्टिहीनों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए समाज के नजरिए में बदलाव लाने की मुहिम में जुटे हैं।

जॉर्ज ने एक विज्ञापन कंपनी की नौकरी छोड़कर दृष्टिहीनों की जिंदगी में रोशनी लाने के लिए लोगों के नजरिए में बदलाव लाने की मुहिम शुरू करने का फैसला किया था. बचपन से ही क्रिकेट के शौकीन जॉर्ज ने दृष्टिहीनों के लिए क्रिकेट को बढ़ावा दिया और 1990 में दिल्ली में पहली राष्ट्रीय चैम्पियनशिप आयोजित की।

दृष्टिहीनों के लिए हेल्पडेस्क चलाते हैं जॉर्ज –

इसी दिशा में और एक कदम आगे बढ़ाते हुए 2005 में उन्होंने रेडियो कार्यक्रम ‘आईवे : ये है रोशनी का कारवां’ शुरू किया. ऑल इंडिया रेडियो पर देशभर में प्रसारित हुए इस कार्यक्रम में जीवन की चुनौतियों को पार कर सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचे दृष्टिबाधितों ने अपनी सफलता की कहानियां सुनाई।

पढ़ें: मैं चाहता हूं कि दौ-तीन सौ साल बाद इतिहास के किसी कोने में याद किया जाऊं: कुमार विश्वास

आईवे ने आम आदमी के नजरिए में बदलाव लाने के लिए दूरदर्शन पर एक श्रंखला भी पेश की ‘नजर या नजरिया’, जिसका संचालन दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने किया था. जॉर्ज आगे कहते हैं कि यह कार्यक्रम नेत्रहीनों को नहीं, आम लोगों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. वे इसमें ऐसे विषयों को उठाना चाहते थे, जिनके जरिए वे नेत्रहीनता के साथ संभावनाओं के आकाश को दर्शा सकें।

आईवे का हेल्पडेस्क भी है, जहां दृष्टिहीनों और उनके परिजन फोन करके अपनी समस्याओं से जुड़े सवाल पूछ सकते हैं, मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं और अपने लिए उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों से जुड़ सकते हैं।

जोर्ज को अब तक मिल चुके हैं कई सम्मान-

जॉर्ज को अपने कार्यों के लिए कई सम्मान और अवॉर्डस से नवाजा जा चुका है, जिनमें सरस्वती सम्मान, लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस, पीपल ऑफ द ईयर 2007 शामिल है. इसके अलावा डिस्कवरी चैनल की सिरीज ‘डिस्कवरी पीपल’ और ‘अवीवा फॉर्वर्ड थिंकर्स’ में भी उन्हें फीचर किया जा चुका है. जॉर्ज ने सामान्य स्कूल, कॉलेज से शिक्षा हासिल की।

पढ़ें: जन्मदिन : मैडम क्यूरी के जीवन से जुड़े कुछ तथ्य, क्यूरी महिलाओं के साथ भेदभाव की सबसे बड़ी मिसाल हैं

वह कहते हैं, ‘दृष्टिहीनों से समाज की उम्मीदें बेहद कम होती हैं, लेकिन समाज और स्वयं उसके परिवार को उन्हें सहानुभूति के स्थान पर एक संभावित मानव संसाधन के रूप में देखना होगा. उनके माता-पिता ने उनसे स्कूल में बेहतर करने, घर में अपनी भूमिका निभाने, शिक्षा पूरी होने के बाद एक अच्छी नौकरी की उम्मीद की. किसी भी बच्चे के बड़े होने के दौर में ये उम्मीदें ही उसमें आत्मविश्वास भरती हैं. उम्मीद है, धीरे-धीरे ही सही, लेकिन नजर को देखने के लोगों के नजरिए में बदलाव जरूर आएगा।

source: aajtak

Comments

comments


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *