KANGRA FORT

काँगड़ा नगरकोट किले का नज़ारा 

काँगड़ा जिला जितना बड़ा है उतना ही इसका इतिहास बड़ा है। अगर हम काँगड़ा किले की बात करें तो यह अपने आप मे अनूठा है। काँगड़ा का किला ,नगरकोट , भीमनगर  नाम  से  प्रसिद्ध  यह  किला हिमाचल प्रदेश के  पुराना  काँगड़ा  शहर  के दक्षिण -पश्चिम  में  स्थित  है

तथा बाण गंगा  एवं मांझी नदी के संगम पर एक पहाड़ी की चोटी पर निर्मित है|  किले की प्राचीर से धौलाधार पर्वतमाला का  विहंगम दृश्य दिखाई पड़ता है । मान्यता के अनुसार , इस किले का निर्माण महाभारत काल में त्रिगर्त के  तत्कालीन राजा सुशर्मा चंद्र ने करवाया था ।

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महाभारत ग्रन्थ के अनुसार

त्रिगर्त( काँगड़ा रियासत को वैदिक काल में त्रिगर्त कहा जाता था ), के राजा सुशर्मा चंद्र ने महाभारत युद्ध में कौरवों को सहयोग दिया था। यह भी कहा जाता है की  कौरवों की पराजय से पहले सुशर्मा चंद्र अपने सैनिकों के साथ  युद्ध क्षेत्र से पलायन कर अपनी राजधानी मुल्तान ( पाकिस्तान में ) न लौट कर

त्रिगर्त( काँगड़ा ) कि ओर  कूच किया तथा  त्रिगर्त रियासत को अपने अधिपत्य में ले लिया । राजा सुशर्मा चंद्र ने त्रिगर्त रियासत में अपनी सुरक्षा के लिए  एक अभेद्य  किले का निर्माण करवाया जिसे अब काँगड़ा किला के नाम  से जाना जाता है ।

किले का इतिहास :

किले के प्राचीनतम लिखित प्रमाण महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण सन 1009 ईस्वी से मिलते है । जिसने एक किलेदार को इस किले में तैनात किया जिसे दिल्ली के तोमर शासकों  द्वारा सन 1043 ईस्वी में हटा दिया गया व् कटोच शासकों को पुनः सौंप दिया गया । । सन 1337 में मुहम्मद तुगलक तथा पुनः सन 1351 में फिरोजशाह तुगलक ने इस पर अपना अधिपत्य स्थापित किया था ।

अक़बर के राज्य रोहन

1556 के समय काँगड़ा किला पुनः प्रकाश में आया जिसने इसे जीत कर धर्मचंद कटोच के अधिपत्य में सौंप दिया । सन  1563 में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र माणिक्य चंद कटोच गद्दी पर बैठा । 1571 में अकबर के सेनापति खान जहाँ ने किले  आक्रमण किया परन्तु यह  मुस्लिमो के अधिपत्य में स्थायी रूप से सन  1621 के बाद ही आया ।

जहांगीर ने 14 महीने की पगबन्दी के  किले पर अधिपत्य स्थापित कर मुग़ल गवर्नर सैफ अलिफ खान  निगरानी  सौंप दिया । सन 1781 में सैफ अलिफ खान की मृत्यु  पश्चात बटाला के जय सिंह कन्हैया ने  इसे अपने अधीन लिया ।

1786 में मैदानी क्षेत्रो के बदले इस किले का अधिकार 21 वर्षीय संसार चंद कटोच को सौंप दिया गया । काँगड़ा  पेंटिंग का विकास भी इसी समय में हुआ । सन 1804 -1805 में नेपाल के अमर सिंह थापा के नेतृत्व में गोरखाओं ने चार वर्षो तक काँगड़ा किले की घेराबंदी की ,

तथा गोरखाओं के विरुद्ध सहायता के आश्वासन पर 1809 में संसार चंद एवं  रणजीत सिंह में एक संधि के अनुसार यह  महाराजा रणजीत सिंह को समर्पित किया गया तथा 1846 तक यह किला सिखों के अधिकार में रहने के पश्चात अंग्रेजों के अधिकार में आ गया । 4  अप्रैल 1905  के भयंकर भूकम्प के कुछ समय पुर्व ही अंग्रेजों द्वारा इसे खाली  कर दिया गया था ।

 प्रवेश द्वार :

 मुख्य प्रवेश द्वार महाराजा रंजीत सिंह के नाम पर  है ।यह द्वार महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में बनवाया गया । मुख्य द्वार से किले  के आतंरिक क्षेत्र  पहुंचने तक कई द्वार है हर  द्वार एक शासक को   समर्पित है तथा उसके शासन काल के बारे में दर्शाता है

महाराजा रंजीत सिंह द्वार  से नवाब अलिफ खान को समर्पित आहिनि और अमीरी दरवाजे से होता हुआ एक संकरा रास्ता किले के ऊपर जहांगीरी दरवाजे तक जाता है। कहा जाता है की पुराने दरवाजे को तुड़वा कर  इस दरवजे को जहाँगीर ने बनवाया था इसलिए इस  जहांगीरी दरवाजा कहते है।

MAIN GATE KANGRA KILA

प्रवेश के दाहिने ओर आँगन व् कमरे बने है तथा बांये  ओर  मंदिरों के अवशेष है  दक्षिणी और उत्तरमुखी लक्ष्मीनारायण , शीतला माता , अम्बिका देवी तथा दो लघु जैन मंदिर है । मुख्य मंदिर के साथ किले का सुरक्षा द्वार है जिसे अँधेरी दरवाजा  कहा जाता था।

मंदिरों के मध्य  सीढ़ियां महल का दरवाजा ( पैलेस गेट )  से होती हुई महल के अवशेषों तक जाती है । किले के पिछले भाग में बारूदखाना , मस्जिद , फांसीघर , सूखा तालाब , कपूर तालाब , बारादरी , शिव मंदिर तथा कई कुँए है ।

विनाशकारी भूकंप से किले का नुकसान :

 4 अप्रैल 1905 के भयंकर भूकंप कारण यह किला  तहस – नहस हो गया था , तथा इसे कटोच वंश को पुनः सौंप दिया गया ।  किले के प्राचीनतम अवशेष नौवीं -दसवीं  सदी के हिन्दू एवं जैन मंदिरों के रूप में विध्यमान है ।

वर्तमान समय में  किले का रख-रखाव Royal family of Kangra, Archaeological Survey of India तथा Govt. of Himachal द्वारा किया जाता है।

सन  2002  में Royal family of Kangra द्वारा यंहा पर Maharaja Sansaar Chand Museum की स्थापना की गयी । Maharaja Sansar Chand Museum में किले से प्राप्त अवशेष तथा

कटोच वंश के शासकों  तथा उस समय में प्रयोग होने वाली युद्ध सामग्री , बर्तन , चांदी के सिक्के , काँगड़ा पेंटिंग्स , अभिलेख , हथियार तथा अन्य राजसी वस्तुओं को रखा गया है ।

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