अंत महज एक मुहावरा है.. नहीं रहे ज्ञानपीठ पाने वाले केदारनाथ


हिंदी के मशहूर कवि और लेखक केदारनाथ सिंह का सोमवार रात को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में उनका निधन हो गया। केदारनाथ सिंह नई कविता के अग्रणी कवियों में शुमार किए जाते हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में शामिल केदारनाथ सिंह को 2013 में साहित्य के सबसे बड़े सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था. वह यह पुरस्कार पाने वाले हिंदी के 10वें लेखक थे।

बता दें सांस की तकलीफ के कारण उन्हें 13 मार्च को एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में भर्ती किया गया था। ‘अंत महज एक मुहावरा है’ और ‘दिन के इस सुनसान पहर में रुक सी गई प्रगति जीवन की’ के रचयिता को ‘यह जानते हुए कि जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है’ बचाया न जा सका।

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केदारनाथ सिंह का अंतिम संस्कार मंगलवार को दिल्ली के लोधी रोड स्थित शमशान घाट पर होगा। एम्स से मिली जानकारी के अनुसार, उन्हें संक्रमण की शिकायत भी थी। डॉक्टरों का कहना है कि 86 वर्षीय केदार नाथ काफी समय से बीमारी से जूझ रहे थे। केदार नाथ सिंह हिंदी कविता में नए बिंबों के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं।

केदारनाथ सिंह जी को साहित्य ‘अकादमी पुरस्कार’, ‘व्यास सम्मान’, ‘जीवन भारती सम्मान’, ‘दिनकर पुरस्कार’, ‘कुमारन आशान पुरस्कार’ और ‘मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है। अभी बिल्कुल ‘अभी’, ‘जमीन पक रही है यहां से देखो’, ‘अकाल में सारस’ आदि उनकी प्रमुख रचनाएं काफी लोकप्रिय रहीं।

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केदारनाथ सिंह की प्रमुख कृतियां-

कविता संग्रह : अभी बिल्कुल नहीं, जमीन पक रही है, यहां से देखो, बाघ, अकाल में सारस, उत्तर कबीर और अन्य कविताएं, तालस्टाय और साइकिल
आलोचना :       कल्पना और छायावाद, आधुनिक हिंदी कविता में बिंबविधान, मेरे समय के शब्द, मेरे साक्षात्कार
संपादन :            ताना-बाना (आधुनिक भारतीय कविता से एक चयन), समकालीन रूसी कविताएं, कविता दशक, साखी (अनियतकालिक पत्रिका), शब्द  (अनियतकालिक पत्रिका)


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