भारत पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से चार किलोमीटर दूर बसे गांव सतराइयां के हर घर में देश की रक्षा के लिए जान देने वाला एक सिपाही मौजूद है। बात 1965 की जंग हो या फिर 1971 या 1999 कारगिल युद्ध की, हर बार पाकिस्तान को हार का सामना करने में गांव के सिपाहियों ने हिस्सा लिया। यही कारण है कि पाकिस्तान में भी इस गांव की बहादुरी के चर्चे होते हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में भी गांव के इंद्र सिंह शामिल रहे। जिन्होंने बरमा में जेल काटी। इसके लिए उन्हें सम्मान में ताम्रपत्र भी दिया गया।करीब पांच हजार की आबादी वाले इस गांव में 1500 से ज्यादा घर हैं।

भारत की हर सेना में हैं यहाँ के लोग :

भारतीय सेना, सीमा सुरक्षा बल, एयरफोर्स, सीआईएसएफ, बीएसएफ, पुलिस, एसएसबी जैसी तमा
म फोर्स में गांव के लोग हैं। हर घर से एक सदस्य इन सुरक्षा बलों में काम कर चुका या कर रहा है। कई घरों में तो परिवार के सभी पुरुष सदस्य किसी न किसी फोर्स में अपनी सेवा दे रहे हैं।

satraiya-village

रिटायर्ड सूबेदार बाबू सिंह 7 डोगरा रेजीमेंट में थे। 1965 और 1971 में हुए दोनों युद्ध में सुचेतगढ़ बार्डर पर पाकिस्तान को धूल चटाने वाले जांबाजों में वह शामिल रहे। बाबू सिंह कहते हैं कि वह कुल्लियां में तैनात थे। 1971 में भारतीय सेना सियालकोट तक पहुंच गई थी। यदि वापस आने का आदेश न मिलता तो आधे पाकिस्तान पर कब्जा कर लेते।

 

गांव के ही कैप्टन चैन सिंह भी दोनों लड़ाइयों में शामिल रहे। 1999 कारगिल वार में गांव के ही रिटायर्ड नायब सूबेदार सुदेश सिंह को आपरेशन विजय का हिस्सा रहने पर मेडल भी मिला। उनका कहना है कि कारगिल में जब पाकिस्तान के धोखे की खबर मिली तो खून खौल गया। हमने हिम्मत नहीं छोड़ी और कई साथियों की शहादत की बदौलत जंग जीत ली।

इस गांव का होने पर गर्व पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता राजिंदर सिंह चिब भी इसी गांव के रहने वाले हैं। वह एयरफोर्स में स्क्वार्डन लीडर थे। उनका कहना है कि उन्हें गर्व है कि वह इस गांव का हिस्सा हैं। वह उस गांव में रहते हैं, जहां हर घर में एक सिपाही रहता है।

 

indian-army on-borderSource : amarujala

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