बेग़म अख्तर के नाम से प्रसिद्ध, अख्तरी बाई फ़ैज़ाबादी (7 अक्टूबर 1914- 30 अक्टूबर 1974 ) भारत की प्रसिद्ध गायिका थीं, जिन्हें दादरा, ठुमरी व ग़ज़ल में महारत हासिल थी।उन्होंने मुखर संगीत के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त किया और उन्हें सरकार द्वारा पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

इस मौके पर गूगल ने एक खास डूडल तैयार किया है. इस खूबसूरत डूडल में बेगम अख्तर सितार बजाती दिख रही हैं, वहीं कुछ लोग नीचे हाथ में फूल लिए बैठे नजर आ रहे हैं।

बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को बदा दरवाजा, टाउन भद्रसा, भरतकुंड, फैजाबाद जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ था।बेगम अख्तर का बचपन से ही संगीत के प्रति खास शौक रहा वे प्लेबैक सिंगर बनना चाहती थी पर  परिवार उनकी इस इच्छा के खिलाफ था।

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बेगम अख्तर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत एक दिन का बादशाह से की थी लेकिन दुर्भाग्य से उनकी यह फिल्म नहीं चल सकी. इसके कुछ समय बाद वो लखनऊ लौट आए और वहां पर उनकी मुलाकात निर्माता-निर्देशक महबूब खान से हुई।बेगम अख्तर की प्रतिभा से महबूब खान काफी प्रभावित थे।

उन्हें महबूब खान ने  मुंबई बुलाया. अबकी बार मुंबई जाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और फिल्मों के साथ-साथ अपने गायकी के शौंक को भी बरकार रखा और मल्लिका-ए-गजल के नाम से पहचानी जाने लगी।

उन्होंने ‘वो जो हममें तुममें क़रार था, तुम्हें याद हो के न याद हो’,‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया’, ‘मेरे हमनफस, मेरे हमनवा, मुझे दोस्त बन के दवा न दे’, जैसी कई दिल को छू लेने वाली गजलें गायी हैं।

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उन्होंने महबूब खान और सत्यजीत रे जैसे फिल्कारों की फिल्म में भी अभिनय किया लेकिन गायन का सिलसिला भी साथ-साथ चलता रहा। 1940 और 50 के दशक में गायन में उनकी लोकप्रियता चरम पर थी।

निकाह के बाद वह करीब 5 साल तक संगीत की दुनिया से दूर रही. इसके बाद वह बीमार रहने लगी तो डाक्टरों ने बताया कि उनकी बीमारी की एक ही वजह है कि वो अपने पहले प्यार, यानी कि गायकी से दूर हैं। उनके शौहर की शह पर 1949 में वो एक बार फिर अपने पहले प्यार की तरफ़ लौट पड़ीं और ऑल इंडिया रेडियो की लखनऊ शाखा से जुड़ गयीं और मरते दम तक जुड़ी रहीं।

अपनी जादुई आवाज से श्रोताओं को मदमग्न करने वाली यह महान् गायिका का देहांत 50 वर्ष की उम्र में 30 अक्तूबर 1974 को हो गया था। बेगम अख़्तर की तमन्ना आखिरी समय तक गाते रहने की थी जो पूरी भी हुई। मृत्यु से आठ दिन पहले उन्होंने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी की यह ग़ज़ल रिकार्ड की थी।

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