पिता बेचते हैं लंगोट, बेटी ने भारत केसरी बन जीते 10 लाख रूपये


कहते हैं कुछ लोग अपनी इच्छा के अनुरूप परिणाम को प्राप्त कर लेते हैं, किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिद और जूनून होना चाहिए। जो लोग अपने कार्य को दृण इच्छा शक्ति से पूर्ण करते है वो लक्ष्य को निःसंदेह हासिल करते है। यदि मनुष्य चाहे तो सब कुछ सम्भव है। उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कार्य को ईमानदारी से और दृण संकल्प के साथ करना चाहिए।

दृण इच्छा शक्ति के बल पर ही तेनसिहं और बछेन्द्री पाल जैसे पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर विजय पताका फहराई। ऐसा ही कुछ देखने को मिला भारत केसरी दंगल-2017 में। जहाँ लंगोट बेचकर परिवार का गुजारा करने वाले एक पिता सूरज काकरान की बेटी दिव्या ने बड़े-बड़े सूरमा महिला पहलवानों को रिंग में धूल चटाकर भारत केसरी बनने का गौरव हासिल किया है। दिव्या को इनाम के रूप में 10 लाख रुपए मिलेंगे।

लंगोट बेचकर होता है परिवार का गुजारा-

War Heroes Memorial Stadium में हुए दंगल में दिव्या ने 69+ वेटकटेगरी में धाकड़ महिला पहलवान पिंकी को हराकर ये फाइट अपने नाम की। दिव्या के पिता सूरज काकरान अब भी लंगोट बेचते हैं। उनके परिवार के लिए यही एकमात्र इनकम का जरिया है। ये लंगोट बनाने में दिव्या की मां संयोगिता मदद करती हैं।

दिव्या के पिता का भी सपना था रेसलर बनना-

भारत केसरी बनकर अपने परिवार का नाम रोशन करने वाली और जूनियर नेशनल लेवल 14 गोल्ड मेडल जीतने वाली दिव्या बताती हैं कि मेरे पिता सूरज काकरान 1990 के दौरान रेसलर बनने का सपना लिए दिल्ली आए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। पिता के असफल होने के बाद वे गांव सरधना लौट आए एवं शादी करने के बाद दूध बेचने लगे, लेकिन वो यहां भी फेल हो गए. इसके बाद दिव्या के पिता जीविका चलाने के लिए दिल्ली चले आए।

गीता बबिता से भी ज्यादा संघर्षपूर्ण है दिव्या और की कहानी-

अपने पिता को हीरो मानने वाली दिव्या बताती हैं कि मेरे पिता ने ये सोच तो आसानी से लिया कि बेटी को रेसलर बनाऊंगा, लेकिन ये उतना आसान भी नहीं था। दिव्या बताती है कि गांव और अगल-बगल के लोग भद्दे कमेंट किया करते थे. कहते थे बेटी को बर्बाद कर रहा है, लेकिन पिता ने ध्यान नहीं दिया. हालांकि हमारे पास पैसे बिल्कुल भी नहीं थे, लंगोट के बिजनेस से घर का गुजारा भी बड़ी मुश्किल से होता था. यहीं मेरा संघर्ष गीता बबिता (फोगाट बहनो) से अलग हो जाता है।

दिव्या ने पहले दंगल में जीते थे 30 रुपए-

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए दिव्या बताती हैं कि मैंने अपना पहला दंगल पुरुष पहलवान से किया था वो भी पैसे के लिए, उस जीत में सिर्फ 30 रुपए मिले थे। उन 30 रुपयों ने मेरी जिंदगी बदल दी। उसके बाद मैं पुरुषों को चैलेंज कर दंगल करने लगी थी। पैसे भी ज्यादा मिलने लगे थे और मीडिया भी मुझे महत्त्व देने लगी थी।

भारत केसरी बनने के बाद क्या बदला पायेगा दिव्या का जीवन?

भारत केसरी दिव्या ने बताया कि पुरुषों के साथ दंगल करने का फायदा ये मिला कि मुझे दिल्ली की टीम में जगह मिल गई और इंडियन कैंप में भी नाम आ गया। आगे दिव्या कहती है कि अब जब मैं भारत केसरी भी जीत चुकी हूं तो देखना है क्या बदलता है? मेरी जरूरते बड़ी हैं, इसलिए जीत की जिद है. कभी हारना नहीं चाहत। दिव्या का अगला टारगेट ओलंपिक में गोल्ड मैडल जीतना है।


Related posts

Leave a Comment