2 अप्रैल का दिन भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन रहा. जिस तरह कल पूरे देश में दलितों द्वारा नंगा नाच किया गया उसे समाज का हर वर्ग याद रखेगा. कल एससी एसटी एक्ट में बदलाव के लिए दलित संगठनों ने देशभर में प्रदर्शन कर उत्पात मचाया. निश्चित रूप से जिस समाज को आज तक आप और हम दबा हुआ, पिछड़ा हुआ और शोषित बोलते हुए आये हैं उस समाज ने सड़कों पर बसों और कारों को निशाना बनाकर उन्हें आग के हवाले कर दिया. ट्रेनों को रोककर तोड़फोड़ की गई. पुरे दिन पुलिस थानों में आग लगाये जाने की खबरें आती रही और पुलिस प्रशासन इन गुंडों के सामने बेबस नजर आया.

दलित गुंडे भीमराव अंबेडकर की तस्वीरें और बड़े बड़े बैनर लेकर जिस तरीके से सड़कों पर निकले तो उनके कामों को देख कर बाबा भीमराव अंबेडकर भी दुखी हो रहे होंगे. निश्चित रूप से भीमराव अंबेडकर कभी नहीं चाहते होंगे कि भारत के एक आम व्यक्ति की मौत उनके आंदोलन में हो. भारत की सार्वजनिक संपत्ति को आग लगा दी जाए. सरकारी बसों में आग लगा दी जाए.

लेकिन इन गुंडों ने लोगों को सड़कों पर रोक दिया गया. बसों में आग लगाई गई. पुलिस थानों में आग लगाई गई.  मध्यप्रदेश के भिंड मुरैना में तो लोगों को आन्दोलन के नाम पर सरेआम मार दिया गया .

बाबा के गुंडों ने मेटरनिटी होम में महिलाओं से छेड़छाड़

मुरार में 150 से ज्यादा उग्रवादी मुरार मेटरनिटी होम में पहुंचे और ऑपरेशन थिएटर में तोड़फोड़ करना शुरू कर दी। उस समय यहां दो महिलाअों के ऑपरेशन डॉ. गीता को करने थे। विरोध करने पर युवकों ने डॉक्टरों से अभद्रता की उनके साथ छेडछाड की। वार्ड में कब्जा कर लिया। उपद्रवियों ने मुरार थाने के बाहर एक बाइक, मुरार गर्ल्स कॉलेज के पास एक कार और 3 बाइकों को आग लगा दी।

बीमार बुजुर्ग को नहीं जाने दिया अस्पताल रस्ते में ही मौत-

यह तस्वीर 68 वर्षीय बीमार बुजुर्ग की है, जिसे उनका बेटा कंधे पर लादकर अस्पताल भागा हुआ जा रहा है। लेकिन बीच सड़क पर बाबा के गुंडों की वजह से उन्हें समय पर इलाज नहीं मिल सका. बिजनौर के बारुकी गांव निवासी 68 वर्षीय लोक्का सिंह बेहताशा पेट दर्द से पीड़ित थे और सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी। अपने पिता को दर्द से कराहते देख बेटे रघुवर सिंह ने अपने बीमार पिता को ऐंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाना चाहा, लेकिन बीच सड़क में उग्रवादियों ने उन्हें अस्पताल नही जाने दिया। इसके बाद पिता को कंधे पर लादकर जब रघुवर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों ने पिता को मृत घोषित कर दिया।

आखिर इस हत्या का जिम्मेदार कौन?

दादाजी की तेरहवीं के लिए सामान खरीदने आया था, उपद्रवियों ने गोली मार दी:

सोनी गांव निवासी जबर सिंह पुत्र श्रीराम के दादाजी का निधन हो गया है। उनकी तेरहवीं के लिए जबर सिंह मेहगांव सामान खरीदने आया था। इसी बीच उपद्रवियों ने हंगामा कर दिया। जबर सिंह कुछ समझ पाता तब तक किसी ने गोली चला दी जो जबर सिंह को लगी और वह गिर पड़ा। जबर सिंह को घायल देख साथ आए लोग उसे इलाज के लिए जेएएच लेकर आए।

छात्रा को भी नहीं छोड़ा बाबा के गुंडों ने-

बाबा के गुंडों के हमले में घायल छात्रा प्रियांशी ने बताया, “मैं तो रोजाना की तरह बस में बैठकर अपने कॉलेज जा रही थी। बस जब थाटीपुर पहुंची तो बहुत सारे लोग हमारी बस की तरफ दौड़ कर आ रहे थे और सभी के हाथ में डंडे थे उन सभी लोगों के चेहरे पर कपड़े बंधे थे। ड्रायवर बस छोड़कर भाग चुका था। हम लोग बस में बैठे थे और हमें उम्मीद थी कि वो लोग हमें परेशान नहीं करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, उन लोगों ने बसों के कांच फोड़ना शुरू कर दिए और वो कांच हमारे सिर, हाथ व चेहरे पर तेजी से जाकर लगे। जिससे मैं ही नहीं बल्कि मेरी साथी भी घायल हो गईं। इसके अलावा उन लोगों ने बस में अंदर चढ़कर छात्राओं के साथ अश्लील हरकत की और हम लोगो के साथ मारपीट करने लगे। घायल छात्रा ने बताया यदि इन लोगों को किसी व्यवस्था से परेशानी है तो उसका विरोध शासन-प्रशासन के स्तर पर करना चाहिए था हमें या दूसरे लोगों से मारपीट करके क्यों भय का माहौल बनाया जा रहा है।

गुंडों के हमले से बच्ची दहशत के मारे कांप उठी

यह तस्वीर दतिया की है। जहां उपद्रवियों ने तीन घंटे तक शहर में तोड़फोड़ और मारपीट की। जो दुकान खुली दिखी उसके दुकानदार को पीटा। पीतांबरा पीठ के बाहर की दुकानें तोड़ दी गईं। वहां के हालात को 10 साल की इस बच्ची की आंखों में देखा जा सकता है। शहर में हंगामा होते ही बच्ची स्कूल से निकलकर छिपते-छिपाते घर जा रही थी, तभी सामन उपद्रवी दिख गए। बच्ची दहशत के मारे कांप उठी। तभी वहां सब इंस्कपेक्टर शैलेंद्र गुर्जर पहुंचे और बच्ची को गोद में उठा लिया। बच्ची इतनी डरी हुई थी कि घर का पता भी नहीं बता पा रही थी। शैलेंद्र न उसे दुलारा और उससे प्यार से घर का पता पूछा। फिर खुद ही उसे घर तक छो ड़कर आए।

उत्तर प्रदेश में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर चलाई गोलियां


उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भी हिंसा भड़क उठी. प्रदर्शनकारियों ने हापुड़, आगरा, मेरठ, सहरानपुर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में पुलिस पर पत्थर बरसाए और दुकानों को लूट लिया. प्रदर्शनकारियों ने कई गाड़ियों को अपना निशाना बनाया और उनकी खिड़कियां तोड़ दीं.

कुछ जगहों पर सरकारी संपत्तियों को भी नुकसान पहुंचाया गया. मेरठ में पुलिस दल पर कुछ लोगों ने कथित रूप से गोलियां चलाईं, जबकि आंदोलनकारियों ने एक यात्री बस को आग के हवाले कर दिया.


मेरठ में 500 दलित युवकों ने मीडिया को निशाना बनाया और प्रदर्शन की तस्वीरें उतारने का प्रयास कर रहे पत्रकारों के कैमरे तोड़ दिए. गुजरात के बड़े कस्बों और शहरों में दलितों ने प्रदर्शन किए. अहमदाबाद और जामनगर में तोड़फोड़ की खबरें सामने आईं हैं।

भारत के लगभग हर राज्य में हिंसा की गयी , ऐसे में अब सवाल यह उठता है कि क्या जब दलितों के लिए सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ रहा है तो क्या ये समाज का वर्ग शोषित बोला जा सकता है? जिन्होंने हिंसा का सहारा लिया हो क्या उन लोगों को आरक्षण की जरूरत अब है?

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