प्रकाश झा द्वारा प्रोड्यूस और अलंकृता श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को सेंसर बोर्ड ने असंस्कारी बताते हुए बैन कर दिया है। आपको बताते चलें कि लिपस्टिक अंडर माइ बुर्का’ (lipstick under my burkha) को मुंबई फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का ऑक्सफैम अवॉर्ड मिल चुका है और तोक्यो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी इसे द स्पिरिट ऑफ एशिया प्राइज दिया जा चुका है, लेकिन सेंसर बोर्ड को ये फिल्म रास नहीं आई। इस फिल्म में रत्ना पाठक शाह, कोंकणा सेन शर्मा, विक्रांत मैसी, अहाना कुमरा, प्लाबिता बोरठाकुर और शशांक अरोड़ा ने अहम भूमिकाएं निभाई हैं। चर्चा है कि बोर्ड ने इस फिल्म को महिलावादी फिल्म बताकर इसे सर्टिफाई करने से ही इनकार कर दिया है, जिसके बाद से फिल्मी जगत से जुड़े कई दिग्गज इस फैसले से हैरान और नाराज हैं। जब सेंसर बोर्ड चीफ पहलाज निहलानी से इस बारे में सवाल किया गया तो बिना जवाब दिए वह टाल-मटोल करते हुए आगे निकल गए।

मुस्लिम महिला सशक्तिकरण को दर्शाती है फिल्म-

Lipstick Under My Burkha की कहानी ऐसी चार महिलाओं पर बेस्ड है, जो अपनी घि‍सी पिटी जिंदगी के खि‍लाफ खड़ी होना चाहती हैं। जो खुद को समाज के बंधनों से मुक्त करना चाहती हैं. फिल्म में कोंकणा एक दुखी हाउसवाइफ के किरदार में नजर आ रही हैं जो कि तीन बच्चों की मां हैं. वहीं रतना पाठक 55 साल की विधवा का रोल अदा कर रही हैं जिसकी जिंदगी में एक बार फिर जैसे जवानी की बहार आ गई है, बाल सफेद हो चुके हैं लेकिन फोन पर रोमांस के पलों की वजह से जैसे उसके दिलो दिमाग पर जवानी का मंजर छा गया है।  अहाना कुमरा एक ब्यूटीशन के किरदार में है जो अपने प्यार के साथ छोटे शहर से भाग जाना चाहती है. एक्ट्रेस प्लबीता एक कॉलेज गर्ल की भूमिका में है जो एक पिछड़े माहौल से आती हैं लेकिन उसका सपना एक पॉप सिंगर बनना है।

 

क्या मुस्लिम महिलाओ को बराबरी का हक़ नहीं?

हिन्दू धर्म पर कटाक्ष करती हुई “ओह माय गॉड” और “पीके” जैसी फिल्मो को सेंसर बोर्ड द्वारा हरी झंडी दे दी जाती है, लेकिन मुस्लिम महिलाओ को लेकर आवाज उठाती हुई फिल्म को सेंसर बोर्ड बैन कर देता है। क्या सेंसर बोर्ड भी मुस्लिम महिलाओ को सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन मानता है जैसा की उनके साथ हो रहा है उन्हें भी आजादी का पूरा हक़ है उनके भी अपने सपने है वो भी खुलकर जीना चाहती है, लेकिन लगता है जैसा भेदभाव मुस्लिम महिलाओं के साथ उनके समुदाय में हो रहा है बैसा ही फिल्म सेंसर बोर्ड द्वारा।

जैसा कि कई मुस्लिम संगठन और मुस्लिम महिलाओं द्वारा ट्रिपल तलाक की प्रथा को खत्म करने की मांग को लेकर जहां विवाद चल रहा है उसी बीच में समाज के दायरे से परे महिलाओं की ख्वाईशों की कहानी बयां करती फिल्म ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ रिलीज हो जाती तो इस तरह की प्रथा का विरोध करने वालों के मुंह पर वाकई एक तमाचा होता।

फिल्मों को वर्गीकृत किए जाने की जरूरत है, न कि सेंसर की-

श्याम बेनेगल कमिटी ने बोर्ड को सर्टिफिकेशन के तरीके में बदलाव करने की सलाह दी थी, इसके बावजूद फिल्म को मुश्किलों को सामना करना पड़ा है। श्याम बेनेगल ने सीएनएन न्यूज़ 18 से हुई बातचीत में कहा, चूंकि उन्होंने फिल्म नहीं देखी है और उन्हें पता नहीं है कि यह फिल्म किस चीज को लेकर है, लेकिन इस तरह किसी भी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा, ‘एक कमिटी जिसे सरकार ने इसलिए सिर्फ तैयार किया है ताकि सर्टिफिकेशन के तरीके पर ध्यान दिया जाए। फिल्मों को वर्गीकृत किए जाने की जरूरत है, न कि सेंसर की। सेंसर करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। हम योग्यता और परिपक्वता के आधार पर क्लासिफिकेशन के बारे में बातें कर रहे हैं। इस बारे में कोई जानकारी नहीं कि इस बारे में जो सजेशन दिया गया है उसे लागू किया गया है या नहीं।

फिल्म बैन किये जाने पर बॉलीवुड ने जताई नाराजगी-

सेंसर बोर्ड के इस फैसले के बाद बॉलीवुड की कई हस्तियों ने नाराजगी जाहिर की है। इनमें फिल्मकार फरहान अख्तर और पूजा भट्ट भी शामिल है। फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा है कि अब वक्त आ गया है कि इंडस्ट्री मिलकर लड़ाई लड़े। अग्निहोत्री के मुताबिक वो पूरी तरह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में हैं, उन्होंने आगे कहा कि प्रकाश झा को इस पर चुप नहीं बैठना चाहिए और लड़ना चाहिए। ट्विटर पर भी कई लोगों ने इसके खिलाफ ऐतराज जताया है।  आपको बताते चलें कि भारत के छोटे से शहर की कहानी पर बेस्ड ‘लिपस्टिक अंडर माइ बुर्का’ में कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, अहाना कुमरा, प्लाबिता बोरठाकुर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आज़ाद जीवन जीने की तमन्ना रखती हैं।

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