21 से 25 साल की उम्र से पहले आपको ज़रूर देखनी चाहिए, ये प्रेरणादायक फिल्में


ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट ये फ़िल्में :

हम में से अधिकांश लोगों की आदत होती है कि कोई भी फिल्म देखने के बाद उसके किरदार से खुद को जोड़ने लगते हैं या फिर फिल्म की कहानी से अपनी ज़िंदगी की तुलना करने लगते हैं। ऐसे में कुछ बॉलीवुड फिल्में ऐसी हैं, जो आपकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हो सकती है। इसलिए 25 साल की उम्र से पहले आपको एक बार ये फिल्में ज़रूर देख लेनी चाहिए, क्या पता इससे आपके जीवन में कोई बदलाव आ जाए।

 3 इडियट्स

हम अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं गंभीर विषयों पर चर्चा करते हैं, लेकिन इन बड़ी बातों को अमल में लाने के लिए जो चीज़ें ज़रूरी यानी बेसिक चीज़ो पर ही ध्यान नहीं देते। इस फिल्म में शिक्षा व्यवस्थआ की कठोर सच्चाई दिखाई गई थी। इस फ़िल्म का कौन दीवाना नहीं है। जिस तरह से इसमे प्रेक्टिकल लाइफ़ जीने का संदेश दिया है वो सच में काबिले तारीफ़ है।

तीन दोस्त कैसे अलग-अलग हालातों से गुज़रने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं और इस बीच दिल की सुनना छोड़ देते हैं, और उनमें से एक दोस्त दिल की बात सुनने का संदेश देता है। वैसे ही भाई अपने दिल की सुनो, बाकी सब बकवास करते हैं।

वेक अप सिड

‘वेक अप सिड’ में जिंदगी के उस हिस्से को दिखाया गया है, जिससे ज्यादातर लोग गुजरते हैं। पढ़ाई खत्म होने के बाद कइयों के सामने कोई लक्ष्य नहीं होता। उनका हर दिन बिना किसी खास योजना के गुजरता है। इसका भी एक खास मजा है कि अगले क्षण हम क्या करेंगे, यह हमें भी पता नहीं होता।

कॉलेज के अंतिम वर्ष में सिड (रणबीर कपूर) फेल हो गया है और जिंदगी में उसका कोई गोल नहीं है। होंडा सीआरवी में लांग ड्राइव, सुबह तक चलने वाली पार्टियाँ, इंटरनेट और वीडियो गेम्स के सहारे सिड की जिंदगी गुजरती है। पैसों का अभाव उसने देखा ही नहीं है। क्रेडिट कार्ड से वह खर्च करता है और डैड पैसे चुकाते हैं।

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रंग दे बंसती

साल 2006 में आई फिल्म रंग दे बसंती न सिर्फ उस साल की एक बड़ी हिट बनी बल्कि इस मूवी ने युवाओं के बीच देशभक्ति की एक नयी लहर जगा दी। पांच दोस्त कैसे अपने दोस्त की मौत और प्रशासन की नाकाम जवाबदेही का बदला लेते हैं इसमें ये दिखाया गया है।

एक डॉयलाग से ही सारी बातें साफ़ हो जाती हैं “ विवदित युद्ध विमान मिग-21 में आई तकनिकी खराबी एवं रक्षा दलालों के हाथों पिसती हमारी युवा आबादी को डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा जी ने बखूबी कैमरा में उतार हम सब को अपने आप से एक सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई में देश की सुरक्षा सही हाथों में है।

भाग मिल्खा भाग

भाग मिल्खा भाग में मिल्खा सिंह के बचपन और देश के विभाजन को दिखाया गया है। विभाजन के बाद हुए दंगों को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। पिता के कहने पर वे अपने गांव से भागे थे। भागने का यह प्रतीक ही उनकी जिंदगी  बन गया। बचपन की उन स्मृतियों को भुलाकर कुछ हासिल करना निश्चित ही बडे साहस का काम है।

राकेश बताते हैं, उन्होंने बचपन में ही सब कुछ खो दिया था। भारत-पाकिस्तान में जब आजादी  का जश्न मनाया जा रहा था, तब मिल्खा सिंह अपने परिवार के साथ विभाजन का दर्द झेल रहे थे। आज के पाकिस्तान के मुल्तान इलाके में गोविंदपुरा  गांव है। परिजनों की हत्या के चश्मदीद गवाह थे मिल्खा।

तारे ज़मीन पर

हर कोई व्यक्ति जिसको बच्चों से दो चार होना होता है  उसे ये फिल्म जरूर देखनी चाहिये और अगर आप उनमें से हैं जो चाहते हैं कि उनके बच्चे आलराउंडर बने, क्लास के टॉपर बने तो उनको भी ये फिल्म जरूर देखनी चाहिये। मेरी मनपसंद फिल्मों की लिस्ट में इस फिल्म का नाम भी आज से जुड़ गया है।

इस फ़िल्म को देखने के बाद Abnormal बच्चों के प्रति आपका नज़रिया बदल जायेगा। एक बच्चा पढ़ाई में कमजोर होने के बाद भी कला में हुनरबाज़ हो सकता है, बस उसे परखने वाला चाहिए।

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स्वदेश

एक भारतीय नवयुवक “मोहन” की जो भारत से कोसों दूर, मीलों दूर, सात समुद्र पार अमेरिका में रहकर पढाई कर रहा है और नासा में एक प्रोजेक्ट पर काम भी कर रहा है। १२ साल अमेरिका में रहने के बाद “मोहन”, भारत वापिस आता है ताकि अपनी दादी “कावेरी अम्मा” को अपने साथ अमेरिका ले जा सके। “कावेरी अम्मा” “गीता” और “चीकू” के साथ चरणपुर नाम के गाँव में रहती है।

“मोहन” जब चरणपुर गाँव पहुँचता है तो उसे पता चलता है “भारत” के गाँव में वह आधुनिक भारत नहीं बसता जिसे उसने दिल्ली जैसे सहर में देखा था। “मोहन” गाँव के पोस्टमॉस्टर से मिलता है जिसने पहली बार ईमेल और इन्टरनेट के बारे में मोहन के मुह से सुना है। पोस्टमॉस्टर ईमेल और इन्टरनेट के बारे में बहुत कुछ जानना चाहता है।


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