एक नाई अरबों का मालिक हो सकता है, सोचा है कभी आपने? आपको यह बात झूठी लगेगी, लेकिन यह सच है। बेंगलुरु में सेंट मार्क्स रोड पर प्रसिद्ध बाउरिंग इंस्टिट्यूट में जी. रमेश बाबू का सलून है। एक हेयरकट का वह सिर्फ 75 रुपये लेते हैं।

42 साल के रमेश एक दिन में करीब 8 कस्टमर्स को अटेंड करते हैं। वह सुबह और शाम में 2-3 घंटे दो शिफ्टों में काम करते हैं। लेकिन इन दो शिफ्ट के बीच में जो करते हैं वह किसी अजूबे से कम नहीं। वह दिन के इस समय में एक विशाल कार रेंटल कंपनी के सीईओ के रूप में अलग-अलग दफ्तरों में बैठते हैं। इस कंपनी के पास लग्जरी कारों का एक बेड़ा है जिसमें 3.3 करोड़ की रोल्ज रॉयस और कई तरह की मर्सिडीज, बीएमडब्लू, वोल्क्सवैगन और इनोवा शामिल है।

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उनकी कंपनी रमेश टूर्स ऐंड ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड 127 कारों की मालिक है और करीब 120 कर्मचारी इसके पे रोल पर है। उनमें से ज्यादातर ड्राइवर्स हैं जो 14,000 से कम मासिक वेतन नहीं लेते हैं। इसके अलावा वे इंसेन्टिव्स भी कमाते हैं। रमेश ने बताया, ‘इस फील्ड में देश में हमारी कंपनी सबसे टॉप थी।’

रमेश जब सिर्फ 7 साल के ही थे तो उनके पिता चल बसे। बाद में गरीबी और भूख से संघर्ष करते हुए वह इस मुकाम पर पहुंचे। उनकी सफलता उनके कठिन परिश्रम, सफल होने की तीव्र इच्छा और कुछ लोगों की उन पर कृपा का परिणाम है।

वह बताते हैं, ‘ब्रिगेडियर रोड पर हमारा एक सलून था। दुकान का नाम ‘मॉडर्न हेयर ड्रेसर्स’ था और यह 1928 में मेरे दादाजी ने खोला था। मेरे पिता अपनी मृत्यु से पहले तक इसे चलाते थे। उस समय मैं 7 साल का था और मेरे दो छोटे भाई थे।’

आगे उन्होंने बताया, ‘पिता की मृत्यु के बाद हम सबसे पालन-पोषण की जिम्मेदारी हमारी मां पर आ गई जिन्होंने घरेलू नौकरानी का काम शुरू कर दिया। कई सालों तक तो हालत यह रही कि हमें एक वक्त का खाना भी मुश्किल से मिलता था। यही चीज ऐसी मेरी आदत बन गई कि आज भी मैं नाश्ता नहीं लेता हूं।’

घर की आर्थिक स्थिति सही नहीं होने के बावजूद भी रमेश ने पढ़ाई पूरी लगन के साथ की और क्लास में टॉप तीन रैंक पाने वालों में शामिल रहे। वह अच्छे खिलाड़ी भी रहे हैं। उन्होंने स्कूल में फुटबॉल खेला और 1500 मीटर्स ऐथलेटिक में जूनियर नैशनल्स में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व किया।

13 साल की उम्र में उन्होंने न्यूजपेपर डिलिवरी बॉय का काम शुरू किया और 60 रुपये प्रति महीने कमाते थे। उनकी मां ने टेलरिंग के छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए और कुछ अलग से पैसा कमाने लगीं। लेकिन, उससे परिवार की स्थिति बदलना बहुत ही मुश्किल था।

वह एक घटना के बारे में बताते हैं जब वह 5वीं कक्षा में थे। उस समय परिवार के सलून को उनके चाचा चलाते थे जो उनको हर दिन आय के शेयर के रूप में 5 रुपये हर दिन दिया करते थे। रमेश ने बताया, ‘मैं 5वीं कक्षा में था और हमें पहली बार स्कूल में फाउंटेन पेन इस्तेमाल करने के लिए कहा। इससे पहले हम लिखने के लिए सिर्फ पेंसिलों का इस्तेमाल करते थे।

मैं अपनी दुकान पर गया और दुकान पर काम कर रहे व्यक्ति से, जिसे मेरे पिता ने काम पर रखा था, कहा कि मुझे पेन की जरूरत है। उन्होंने मुझे 3.50 रुपये दिए और मैंने उस पैसे से एक पाइलट पेन खरीद लिया। शाम में जब मैं अपनी दुकान पर गया तो चाचा बहुत गुस्सा हुए। उन्होंने मुझसे पेन छीन ली और कहा कि मुझे इतनी महंगी कलम की जरूरत नहीं है और मुझे उसकी बजाए एक सस्ती पेन दी। उस घटना से सफल होने का मुझ पर जुनून सवार हो गया।’

उनको दो बेटी और एक बेटा है। बड़ी बेटी कोठागिरी के एक प्रसिद्ध रेजिडेंशल स्कूल में पढ़ती है और वह उसकी (बेटी) शिक्षा पर हर साल 1.5 लाख रुपये खर्च करते हैं।

उनके जीवन का सबसे अहम फैसला नाई का हुनर सीखना था। 1990 में उन्होंने परिवार के हेयर सलून की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली और इसका नाम बदलकर ‘इनर स्पेस’ रख दिया। युवा वर्ग के बीच वह काफी लोकप्रिय हो गए जो उनकी दुकान पर लाइन लगाकर खड़े होते थे और उन दिनों वह इंतजार कर रहे कस्टमर्स को ध्यान में रखते हुए सुबह के 3 बजे तक काम करते थे।

हालांकि वह प्री यूनिवर्सिटी कोर्स पूरा नहीं कर सके लेकिन बाद में इलेक्ट्रॉनिक्स में डिप्लोमा कर लिया। दो साल बाद उन्होंने एक प्राइवेट कंपनी के मार्केटिंग ऐग्जिक्युटिव के रूप में काम किया। लेकिन उनके जीवन में टर्निंग पॉइंट 1995 में उस समय आया जब लोन पर उन्होंने मारुति ओम्नी ली। एक शुभचिंतक की सलाह पर उन्होंने अपनी कार खरीदने का फैसला लिया।

इन्टेल उनका पहला क्लायंट था जिसकी बेंगलुरु में उस समय एक छोटा ऑफिस था। इंटेल ने जैसे-जैसे अपने कारोबार को बढ़ाया, वैसे-वैसे उनका बिजनस भी बढ़ा।

पुराने दिनों के बारे में बताते हुए वह कहते हैं, ‘जब हमने इंटेल के साथ काम किया तो उनके पास सिर्फ 4 एंप्लॉयीज थे। हमने 2000 तक उनके काम को देखा और तब तक उनके पास करीब 250 एंप्लॉयीज हो गए और हमारी 25 कारें उनकी ड्यूटी में लगी थीं।’

इसबीच रमेश के क्लायंट की लिस्ट बढ़ती रही। 2004 में वह लग्जरी कार सेगमेंट में घुसे जब उन्होंने अपनी मर्सिडीज बेंज खरीदी। अब उनके पास 68 लग्जरी कारें हैं। बॉलिवुड के ऐक्टर्स, सेलिब्रिटीज और टॉप इंडस्ट्रियलिस्ट जब बेंगलुरु आते हैं तो उनकी कार हायर करते हैं।

इस मुकाम पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपने पुराने पेशे को बंद नहीं किया। इस बारे में पूछने पर वह कहते हैं, ‘मैं उस जॉब को कैसे भूल सकता हूं जिसने मुझे इस मुकाम पर पहुंचाया है?’ न ही वह उनलोगों को भूले हैं जिनलोगों ने उनके कठिनाई भरे दिनों में मदद की थी। वह दो लोगों नंदिनी अशोक और फिलिप लुई का खास तौर पर नाम लेना नहीं भूलते हैं।

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